॥ श्रीहरिः ॥
श्री विश्वकर्मा चालीसा

श्री विश्वकर्मा चालीसा

सनातन परम्परा

🪔 चालीसा

सकल सृष्टि के आदि वास्तुकार भगवान श्री विश्वकर्मा की कृपा, शिल्प-कौशल, यन्त्र-सिद्धि, तकनीकी बुद्धि, आजीविका वृद्धि एवं वास्तु दोष निवारण हेतु चालीस पावन चौपाइयों व दोहों से युक्त मंगलकारी स्तुति।

श्री विश्वकर्मा चालीसा

सकल सृष्टि के आदि वास्तुकार भगवान श्री विश्वकर्मा की कृपा, शिल्प-कौशल, यन्त्र-सिद्धि, तकनीकी बुद्धि, आजीविका वृद्धि एवं वास्तु दोष निवारण हेतु चालीस पावन चौपाइयों व दोहों से युक्त मंगलकारी स्तुति।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ श्री विश्वकर्मणे नमः ॥
अस्य श्री विश्वकर्मा चालीसा स्तोत्रस्य, सनातन ऋषिः कर्ता, श्री विश्वकर्मा भगवान् देवता, अनुष्टुप् छन्दः, शिल्प-विद्या-प्राप्ति-अर्थे, सकल-मनोरथ-सिद्धये जपे विनियोगः।
॥ १ ॥
विनय करौं कर जोड़ि सिर, नवाय सब सुर ईश।
शिल्प विद्या के ईश प्रभु, दीजै आशीष हमीश॥
सकल सृष्टि के मूल प्रभु, विश्वकर्मा भगवान।
करहु कृपा निज दास पर, दीजै विद्या दान॥
॥ २ ॥
जय श्री विश्वकर्म जगवन्दन। सकल सृष्टि के आदि प्रवर्धन॥
शिल्प-शास्त्र के आदि प्रणेता। सकल कला के ज्ञान-निकेता॥
॥ ३ ॥
भुवना सुत भुवनेश अनूपा। शिल्प कला के ज्योति स्वरूपा॥
आदि पुरुष सर्वेश्वर देवा। सुर-नर-मुनि सब करहीं सेवा॥
॥ ४ ॥
देवसभा सुवर्णमय कीन्ही। स्वर्गपुरी की रचना दीन्ही॥
सत्यलोक वैकुण्ठ अपारा। शिव कैलास परम सुखकारा॥
॥ ५ ॥
पुष्पक विमान अति विशाला। गगनगामी सब गुण आलावा॥
इन्द्रपुरी अमरावती बनाई। नन्दन वन की शोभा गाई॥
॥ ६ ॥
कनक लंक रावण हित साजी। जग विख्यात त्रिकूट विराजी॥
यमपुर और वरुण के धामा। रचे विश्वकर्मा सुखकामा॥
॥ ७ ॥
द्वारिकापुरी सिन्धु तट न्यारी। श्रीकृष्ण प्रभु की अति प्यारी॥
हस्तिनापुर पाण्डव हित कीन्हा। मय को भी आशीष प्रभु दीन्हा॥
॥ ८ ॥
इन्द्रप्रस्थ की अनुपम माया। जल में थल अरु थल जल भाया॥
कौरव लखि अचरज उर भारी। मय दानव संग युक्ति सँवारी॥
॥ ९ ॥
त्रिशूल पिनाक चक्र सुदर्शना। रचे विश्वकर्मा जग हर्षना॥
धनुष बाण खड्ग औ भाला। अस्त्र-शस्त्र सब गढ़े कृपाला॥
॥ १० ॥
वज्र अमोघ इन्द्र कर दीन्हा। देवों का सब कारज कीन्हा॥
सूर्य तेज कर्तन प्रभु कीन्हा। दिव्य प्रभा अस्त्रन महँ दीन्हा॥
॥ ११ ॥
जगन्नाथ की मूरत साजी। दारु ब्रह्म में छवि विराजी॥
बलभद्र सुभद्रा सह रूपा। दारु मूर्ति अति दिव्य अनूपा॥
॥ १२ ॥
औजारन के तुम हो त्राता। कल-कारखानों के सुखदाता॥
छेनी हथौड़ी रन्दा आरी। जिन पर कृपा तुम्हारी भारी॥
॥ १३ ॥
लौह काष्ठ पाषाण सुहाना। धातु-प्रस्तर सब पहिचाना॥
शिल्पकार और वास्तु विशारद। तुमरी कृपा लहैं फल चारद॥
॥ १४ ॥
कन्या संक्रान्ति पुण्य तिथी पावन। जयन्ती पर्व सब मन भावन॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावैं। कल-यन्त्रन को फूल पिन्हावैं॥
॥ १५ ॥
जो नर तोर सुयश गुण गावै। सकल पदारथ जग में पावै॥
शिल्प कला में निपुण बनावै। बिगड़े काम तुरन्त सुहावै॥
॥ १६ ॥
रोजी रोजगार बढ़ि जाई। दारिद्र दोष न कबहूँ आई॥
यन्त्र-तन्त्र सब ठीक चलावै। दुर्घटना को दूर भगावै॥
॥ १७ ॥
मन्दिर महल जलाशय बापी। सबहिं निर्माण विधाता व्यापी॥
वास्तु दोष सब दूर निवारे। शरण पड़े के काज संवारे॥
॥ १८ ॥
पंच मुखी प्रभु रूप विशाला। सद्योजात आदि कृपाला॥
मनु मय त्वष्टा शिल्पी देवा। दैवज्ञ सुत पंचों की सेवा॥
॥ १९ ॥
लोहा काष्ठ काँसा पाषाणा। स्वर्णकार सब तुमको जाना॥
बुद्धि ज्ञान कौशल के दाता। सब शिल्पिन के भाग्य विधाता॥
॥ २० ॥
हम अज्ञानी शरण तुम्हारी। राखहु लाज प्रभु तुम हमारी॥
क्षमहु अपराध दास जो कीन्हा। कृपा दृष्टि निज सेवक दीन्हा॥
॥ २१ ॥
नित्य नेम जो पाठ करावै। सुख सम्पत्ति वैभव सो पावै॥
ऋद्धि-सिद्धि नित घर में आवैं। सकल कलेश विपद मिटि जावैं॥
॥ २२ ॥
विश्वकर्मा प्रभु जय जयकारा। भवसागर से करहु उधारा॥
कोटि प्रणाम चरण प्रभु पावै। ज्ञानकोश नित शीश नवावै॥
॥ २३ ॥
विश्वकर्मा प्रभु ध्यान धरि, जो चालीसा गाय।
शिल्प सिद्धि सम्पदा लहै, विघ्न विनासहिं जाय॥
सकल कामना पूर्ण हों, निर्मल होय शरीर।
जय जय जय विश्वकर्म प्रभु, हरहु सकल भव पीर॥