श्री विश्वकर्मा पुराण — माहात्म्य एवं पंचऋषि कथा
स्कन्द पुराण (नागर खण्ड) / उपपुराण परम्परा
स्कन्द पुराण के नागर खण्ड एवं उपपुराण परम्परा से संकलित यह पावन माहात्म्य भगवान विश्वकर्मा के आदि प्राकट्य, पञ्च ब्रह्म ऋषियों (मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी, दैवज्ञ) की उत्पत्ति, सूर्य-तेज कर्तन तथा जगन्नाथ दारुब्रह्म प्राकट्य का सविस्तार वर्णन करता है।
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ श्री परात्पराय विश्वकर्मणे नमः ॥
॥ श्री विश्वकर्मा पुराण — माहात्म्य एवं पंचऋषि पावन कथा ॥
अस्य श्रीविश्वकर्मपुराण-सार-माहात्म्यस्य, भगवान् वेदव्यासः ऋषिः, श्रीविश्वकर्मा परमब्रह्म देवता, अनुष्टुप् छन्दः, सकल-शिल्प-सिद्धि, ज्ञान-समृद्धि, वास्तु-दोष-निवारणार्थे पाठे विनियोगः।
॥ प्रथम अध्यायः — आदि प्राकट्य एवं स्वरूप निरूपण ॥
(सृष्टि के आदि शिल्पी भगवान विश्वकर्मा का प्राकट्य)
॥ १ ॥
अव्यक्ताज्जायते सर्वं विश्वकर्मन् महौजसः।
तस्माद् विश्वमिदं जातं स्थावरं जङ्गमं तथा॥ १ ॥
अर्थ :
परम अव्यक्त, तेजोमय परब्रह्म स्वरूप भगवान् विश्वकर्मा से ही सम्पूर्ण सृष्टि का प्राकट्य होता है। स्थावर (जड़ पर्वत, वृक्ष आदि) और जङ्गम (चेतन जीव-जन्तु, मनुष्य व देवता) — यह समस्त ब्रह्माण्ड उन आदि स्रष्टा विश्वकर्मा से ही उत्पन्न हुआ है।
॥ २ ॥
अष्टमस्य वसोः पुत्रः प्रभासस्य महाद्युतिः।
बृहस्पतेर्भगिन्यां तु योगसिद्धा समुद्भवः॥ २ ॥
अर्थ :
पौराणिक परम्परा एवं स्कन्द पुराण के अनुसार, आठवें वसु महर्षि 'प्रभात' (प्रभास) और देवगुरु बृहस्पति की तपस्विनी भगिनी 'योगसिद्धा' (भुवना देवी) के पावन संगम से परम तेजस्वी भगवान् विश्वकर्मा का प्राकट्य हुआ। वे समस्त कलाओं और शिल्पों के मूल स्वामी हैं।
॥ ३ ॥
स कर्ता सर्वशिल्पानां सर्वकर्मप्रवर्तकः।
त्रिदशानां च शास्त्राणां कर्ता देवपतिः स्वयम्॥ ३ ॥
अर्थ :
वे संसार के समस्त शिल्पों, विद्याओं, तकनीकों और उद्यमों के मूल प्रवर्तक हैं। देवताओं के समस्त दिव्य भवनों, विमानों, अस्त्र-शस्त्रों तथा चौंसठ कलाओं के शास्त्रों की रचना करने वाले वही परम देवशिल्पी हैं।
॥ द्वितीय अध्यायः — पंच ब्रह्म ऋषियों का प्राकट्य एवं पंच शिल्प परम्परा ॥
(भगवान विश्वकर्मा के पाँच मुखों से ५ ऋषियों एवं शिल्पों की उत्पत्ति)
॥ ४ ॥
सद्योजातान्मनुर्जातः सनातनश्च मयोऽभवत्।
अघोरादभवत्त्वष्टा शिल्पी तत्पुरुषादभूत्॥ ४ ॥
अर्थ :
भगवान् विश्वकर्मा के पूर्व (सद्योजात) मुख से महर्षि मनु का प्राकट्य हुआ; उत्तर (वामदेव) मुख से महर्षि मय उत्पन्न हुए; दक्षिण (अघोर) मुख से महर्षि त्वष्टा का जन्म हुआ; और पश्चिम (तत्पुरुष) मुख से महर्षि शिल्पी का आविर्भाव हुआ।
॥ ५ ॥
ईशानाद् विश्वजिज्जातः पञ्चैते ब्रह्मणः सुताः।
शिल्पविद्याप्रवक्तारः सर्वलोकहितैषिणः॥ ५ ॥
अर्थ :
तथा उनके ऊर्ध्व (ईशान) मुख से महर्षि विश्वज्ञ (दैवज्ञ) प्रकट हुए। ये पाँचों 'पंच ब्रह्म' अथवा 'पंच ऋषि' कहलाते हैं। इन पाँचों महर्षियों ने सम्पूर्ण मानव समाज के कल्याण हेतु पाँच प्रमुख शिल्पों और गोत्रों की स्थापना की:
॥ ६ ॥
१. महर्षि मनु (सनग गोत्र): इन्होंने लौह-कर्म (Blacksmithing / Iron Technology) का ज्ञान संसार को दिया — हल,
कुदाल, हँसिया, पहिए, अस्त्र-शस्त्र तथा भारी उद्योगों के मूल प्रवर्तक बने।
२. महर्षि मय (सनातन गोत्र): इन्होंने काष्ठ-कला एवं स्थापत्य (Woodcraft,
Carpentry & Architecture) का विधान रचा — रथ, नौका, काष्ठ-मन्दिर, सेतु और भव्य भवनों का निर्माण सिखाया।
३. महर्षि त्वष्टा (अहभून गोत्र): इन्होंने कांस्य,
ताम्र एवं पीतल धातु-कर्म (Copper, Bronze, Brass Metallurgy) का आविष्कार किया — यज्ञ-पात्र, घण्टा, थालियां, मूर्तियां और कड़ाहे बनाए।
४. महर्षि शिल्पी (प्रत्न गोत्र): इन्होंने प्रस्तर,
पाषाण एवं मूर्तिकला (Stone Sculpture & Masonry) को प्रतिष्ठित किया — देवालय, गुहा-मन्दिर, स्तम्भ, दुर्ग और शैल-प्रतिमाओं को तराशना सिखाया।
५. महर्षि विश्वज्ञ / दैवज्ञ (सुपर्ण गोत्र): इन्होंने स्वर्ण,
रजत एवं रत्न-कला (Goldsmithing & Jewelry) का विधान किया — मुकुट, कुण्डल, रत्न-आभूषण, हार और स्वर्ण-सिंहासन रचने की कला सिखाई।॥ ६ ॥
॥ तृतीय अध्यायः — सूर्य-तेज कर्तन एवं अमोघ दिव्य अस्त्र निर्माण ॥
(पुत्री संज्ञा का विवाह, सूर्य के ताप का निवारण एवं दिव्य अस्त्रों का सृजन)
॥ ७ ॥
विश्वकर्मसुता संज्ञा विवस्वते समर्पिता।
न शशाक तु तं सोढुं तेजः परमदुःसहम्॥ ७ ॥
अर्थ :
भगवान् विश्वकर्मा की परम सुलक्षणा पुत्री 'संज्ञा' का विवाह भगवान् सूर्य नारायण के साथ हुआ। किन्तु भगवान् सूर्य का दिव्य ताप इतना असह्य और प्रचण्ड था कि देवी संज्ञा उनके निकट जाने में असमर्थ हो गईं और उन्होंने अपने पिता के समक्ष जाकर अपनी व्यथा प्रकट की।
॥ ८ ॥
भ्रमिमारोप्य सूर्यं तु ततक्ष द्युतिमण्डले।
अष्टमं भागमुद्धृत्य शान्तं चक्रे विभावसुम्॥ ८ ॥
अर्थ :
तब परम समर्थ विश्वकर्मा ने अपने जामाता भगवान् सूर्य को अपनी दिव्य चक्र-भ्रमि (Celestial Lathe) पर आरूढ़ किया। उन्होंने सूर्य के मण्डल की प्रचण्ड ज्वालाओं को अपनी दिव्य युक्ति से तराश कर उसका आठवाँ भाग कर्तन कर लिया, जिससे भगवान् सूर्य शान्त और मनोहर स्वरूप वाले हो गए।
॥ ९ ॥
तत्तेजसा विनिर्मितं चक्रं विष्णोः सुदर्शनम्।
त्रिशूलं शम्भवे दत्तं शक्तिं स्कन्दाय चाददात्॥ ९ ॥
अर्थ :
सूर्य के उस तराशे गए अलौकिक दिव्य तेज से भगवान् विश्वकर्मा ने भगवान् श्रीहरि विष्णु के लिए तीनों लोकों में अजेय 'सुदर्शन चक्र', देवाधिदेव महादेव शिव के लिए 'त्रिशूल', और देवसेनापति कार्तिकेय के लिए अमोघ 'शक्ति' का निर्माण किया।
॥ १० ॥
यमस्य दण्डं रचयामास कुबेरस्य च पुष्पकम्।
अस्त्राणि चैव दिव्यानि देवानां हितकाम्यया॥ १० ॥
अर्थ :
उसी तेज से उन्होंने धर्मराज यम के लिए न्याय का प्रतीक 'कालदण्ड', यक्षराज कुबेर के लिए गगनगामी 'पुष्पक विमान', तथा समस्त देवताओं के लिए अमोघ बाण, खड्ग और कवचों की रचना कर देव-शक्तियों को सुरक्षित किया।
॥ चतुर्थ अध्यायः — दिव्य नगरियों की रचना एवं श्री जगन्नाथ दारुब्रह्म प्राकट्य ॥
(स्वर्ण लंका, द्वारिकापुरी, इन्द्रप्रस्थ एवं पुरी धाम की पावन कथा)
॥ ११ ॥
लङ्कां सुवर्णप्राकारां चक्रे त्रिकूटमूर्धनि।
द्वारिकां च समुद्रान्ते रम्यां विस्तीर्णशोभिताम्॥ ११ ॥
अर्थ :
भगवान् विश्वकर्मा ने भगवान् शिव के आदेश से त्रिकूट पर्वत पर स्वर्णिम परकोटों वाली 'लंकापुरी' की रचना की। द्वापर युग में जब भगवान् श्रीकृष्ण ने यादवों की रक्षा का संकल्प लिया, तब विश्वकर्मा जी ने सिन्धु सागर के तट पर केवल एक ही रात्रि में विस्मयकारी 'द्वारिका नगरी' का निर्माण कर दिया।
॥ १२ ॥
मयस्य साह्यं दत्त्वा तु पाण्डवानां यशस्करम्।
इन्द्रप्रस्थं व्यधाद् रम्यं जलस्थलविचित्रितम्॥ १२ ॥
अर्थ :
उन्होंने महर्षि मय को अपना पावन आशीर्वाद देकर पाण्डवों के लिए 'इन्द्रप्रस्थ' की रचना करवाई, जिसमें जल में स्थल का और स्थल में जल का विस्मयकारी आभास होता था, जिसे देखकर सम्पूर्ण जगत् आश्चर्यचकित रह गया।
॥ १३ ॥
पुरीक्षेत्रे तु दारुरूपं जगन्नाथं जगत्पतिम्।
गुप्तरूपं समाधाय चक्रे शिल्पीश्वरो विभुः॥ १३ ॥
अर्थ :
कलियुग में जब उत्कल नरेश राजा इन्द्रद्युम्न को समुद्र में बहता हुआ अपौरुषेय दारु (काष्ठ) प्राप्त हुआ, तब भगवान् विश्वकर्मा स्वयं एक वृद्ध शिल्पकार 'अनन्त महाराणा' का रूप धारण कर प्रकट हुए। उन्होंने बन्द मन्दिर के भीतर पन्द्रह दिनों में दारु-ब्रह्म से भगवान् श्री जगन्नाथ, भ्राता बलभद्र और भगिनी सुभद्रा की दिव्य मूर्तियों को रूप प्रदान कर सनातन धर्म की अक्षय कीर्ति स्थापित की।
॥ पञ्चम अध्यायः — विश्वकर्मा पूजन विधान एवं महाफलश्रुति ॥
(शिल्प-साधना, यन्त्र-पूजन एवं विश्वकर्मा जयन्ती का पावन माहात्म्य)
॥ १४ ॥
कन्यागते दिनकरे विश्वकर्मोत्सवो भवेत्।
यन्त्रोपकरणं सर्वं पूजयेत् कुशलो जनः॥ १४ ॥
अर्थ :
जब सूर्य देव कन्या राशि में प्रवेश करते हैं (कन्या संक्रान्ति), तब सम्पूर्ण राष्ट्र में भगवान् विश्वकर्मा का पावन जयन्ती महोत्सव मनाया जाता है। उस दिन प्रत्येक शिल्पकार, शिल्पी, वैज्ञानिक, यन्त्र-संचालक और कर्मयोगी को अपने समस्त औजारों, यन्त्रों, कलमों और कार्यशालाओं को स्वच्छ कर उनका पूजन करना चाहिए।
॥ १५ ॥
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
शिल्पेन धार्यते लोकः शिल्पं ब्रह्मेति निश्चयः॥ १५ ॥
अर्थ :
कर्म और पुरुषार्थ से ही जनक आदि महापुरुषों ने परम सिद्धि प्राप्त की। यह सम्पूर्ण संसार शिल्प और कर्म के आधार पर ही टिका हुआ है। वस्तुतः श्रेष्ठ शिल्प ही ब्रह्म का साक्षात् स्वरूप है, क्योंकि निर्माण ही ईश्वर का प्रत्यक्ष हस्ताक्षर है।
॥ १६ ॥
य इदं पठते नित्यं विश्वकर्मपुराणकम्।
न तस्य दुर्लभं किञ्चिदिह लोके परत्र च॥ १६ ॥
अर्थ :
जो मनुष्य इस 'विश्वकर्मा पुराण' के सार-माहात्म्य का नित्य अथवा पर्व-दिनों में श्रद्धापूर्वक पाठ या श्रवण करता है, उसके लिए इस लोक और परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। उसके कार्य में कभी बाधा नहीं आती, घर में वास्तु-शान्ति रहती है और व्यापार व कला में निरन्तर उन्नति होती है।
॥ इति श्रीविश्वकर्मपुराण-सार-माहात्म्यं सम्पूर्णम् ॥
॥ ॐ श्री विश्वकर्मणे नमः ॥