॥ श्रीहरिः ॥
श्री विश्वकर्मा स्तोत्रम् एवं अष्टकम्

श्री विश्वकर्मा स्तोत्रम् एवं अष्टकम्

शिल्पशास्त्र / पौराणिक परम्परा

🌸 स्तोत्र

शिल्पशास्त्र एवं पौराणिक परम्परा से प्राप्त यह पावन स्तोत्र एवं अष्टकम् समस्त ६४ कलाओं, स्थापत्य, यन्त्रविद्या, वास्तु-दोष निवारण तथा आजीविका-सिद्धि हेतु देवशिल्पी की आराधना का सिद्ध मन्त्रमय पाठ है।

श्री विश्वकर्मा स्तोत्रम् एवं अष्टकम्

शिल्पशास्त्र एवं पौराणिक परम्परा से प्राप्त यह पावन स्तोत्र एवं अष्टकम् समस्त ६४ कलाओं, स्थापत्य, यन्त्रविद्या, वास्तु-दोष निवारण तथा आजीविका-सिद्धि हेतु देवशिल्पी की आराधना का सिद्ध मन्त्रमय पाठ है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री विश्वकर्मणे नमः ॥
अस्य श्री विश्वकर्माष्टक स्तोत्रस्य, सनातन ऋषिः, श्री विश्वकर्मा भगवान् देवता, अनुष्टुप् छन्दः, शिल्प-विद्या-प्राप्त्यर्थे, वास्तु-दोष-निवारणार्थे, सर्व-कार्य-सिद्धये जपे विनियोगः।
॥ ध्यानम् ॥
॥ १ ॥
द्युमन्तं दिव्यवपुषं स्वर्णवर्णाभमुज्ज्वलम्।
किरीटहारशोभाढ्यं विश्वकर्माणमाश्रये॥ १ ॥
अर्थ : जो दिव्य कान्ति से देदीप्यमान हैं, जिनका शरीर स्वर्ण के समान परम उज्ज्वल है, और जो मस्तक पर भव्य रत्नजटित मुकुट तथा वक्षःस्थल पर मणियों के दिव्य हार से सुशोभित हैं — उन आदि शिल्पकार भगवान श्री विश्वकर्मा का मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ।
॥ २ ॥
अक्षसूत्रं कमण्डलुं पुस्तकं ज्ञानमुद्रिकाम्।
दधानं सुप्रसन्नास्यं सर्वविद्याप्रदायकम्॥ २ ॥
अर्थ : जो अपने चार कर-कमलों में रुद्राक्ष-माला (अक्षसूत्र), कमण्डलु, पवित्र वेद-ग्रन्थ (वास्तुशास्त्र), तथा ज्ञानमुद्रा धारण किए हुए हैं, जिनका मुखमण्डल सदा मन्द-हास्य से प्रसन्न रहता है और जो समस्त चौंसठ कलाओं एवं शिल्पों के प्रदाता हैं — उन विश्वकर्मा प्रभु को मेरा बारम्बार प्रणाम।
॥ अथ श्री विश्वकर्माष्टकम् ॥
॥ ३ ॥
जगत्स्रष्टारमीशानं सर्वविद्याप्रवर्तकम्।
शिल्पिनां परमं देवं विश्वकर्माणमाश्रये॥ ३ ॥
अर्थ : जो सम्पूर्ण जगत् के मूल स्रष्टा, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर, समस्त विद्याओं एवं शिल्पों के आदि प्रवर्तक हैं, और संसार के समस्त शिल्पियों, वास्तुविदों व कारीगरों के परम आराध्य देव हैं — उन भगवान् विश्वकर्मा की मैं शरण लेता हूँ।
॥ ४ ॥
दिव्यमालापरीताङ्गं दिव्यगन्धानुलेपिनम्।
सुवर्णकान्तिसंवीतं विश्वकर्माणमाश्रये॥ ४ ॥
अर्थ : जिनका दिव्य अङ्ग पारिजात एवं मन्दार के दिव्य पुष्पों की मालाओं से अलंकृत है, जो चन्दन, अगरु तथा दिव्य सुगन्धित द्रव्यों से लिप्त हैं, और जिनका सम्पूर्ण विग्रह स्वर्णमयी आभा से प्रकाशमान है — उन कृपानिधान विश्वकर्मा का मैं आश्रय लेता हूँ।
॥ ५ ॥
स्वर्णमयीं पुरीं लङ्कां द्वारिकां च मनोरमाम्।
इन्द्रप्रस्थं च यो चक्रे विश्वकर्माणमाश्रये॥ ५ ॥
अर्थ : जिन्होंने त्रिकूट पर्वत पर स्वर्णिम लंकापुरी की रचना की, भगवान श्रीकृष्ण के लिए समुद्र के तट पर अतिशय रमणीय द्वारिकापुरी बसाई, तथा पाण्डवों के लिए विस्मयकारी इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया — उन महान् शिल्पी विश्वकर्मा की मैं वन्दना करता हूँ।
॥ ६ ॥
त्रिशूलं शूलिनो यश्च विष्णोश्चक्रं सुदर्शनम्।
अस्त्राणि यः समाधत्ते विश्वकर्माणमाश्रये॥ ६ ॥
अर्थ : जिन्होंने सूर्य के असह्य तेज को अपनी दिव्य युक्ति से कर्तन करके देवाधिदेव भगवान् शिव का त्रिशूल, जगत्पालक भगवान् श्रीहरि विष्णु का अमोघ सुदर्शन चक्र, और देवताओं के समस्त दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को गढ़ा — उन परम शक्तिशाली विश्वकर्मा का मैं आश्रय लेता हूँ।
॥ ७ ॥
मनुं मयं च त्वष्टारं शिल्पिनं च विशारदम्।
विश्वज्ञं च सुतं चक्रे विश्वकर्माणमाश्रये॥ ७ ॥
अर्थ : जिन्होंने मानव सभ्यता के कल्याण हेतु अपने पाँचों दिव्य मुखों से पाँच ब्रह्म ऋषियों — मनु (लौह शिल्पी), मय (काष्ठ शिल्पी), त्वष्टा (कांस्य व ताम्र शिल्पी), शिल्पी (प्रस्तर शिल्पी), और विश्वज्ञ (स्वर्ण शिल्पी) — को उत्पन्न किया — उन आदि प्रजापति विश्वकर्मा की मैं शरण लेता हूँ।
॥ ८ ॥
दारुब्रह्म जगन्नाथं बलभद्रं सुभद्रिकाम्।
यश्चकार महाभागो विश्वकर्माणमाश्रये॥ ८ ॥
अर्थ : जिन्होंने श्री पुरुषोत्तम पुरी धाम में राजा इन्द्रद्युम्न की अनन्य भक्ति पर प्रसन्न होकर दारु-ब्रह्म से भगवान् श्री जगन्नाथ, भ्राता बलभद्र और भगिनी सुभद्रा की पावन मूर्तियों को प्रकट किया — उन महाभाग्यवान् देवशिल्पी विश्वकर्मा की मैं वन्दना करता हूँ।
॥ ९ ॥
वास्तुशास्त्रस्य कर्तारं यन्त्रमन्त्रप्रसाधकम्।
कारूणामभयं दातारं विश्वकर्माणमाश्रये॥ ९ ॥
अर्थ : जो वास्तुशास्त्र, विमानविद्या और यन्त्र-विज्ञान के आदि प्रणेता हैं, यन्त्र और मन्त्र को सिद्ध करने वाले हैं, तथा संसार के समस्त कारीगरों और श्रमिकों को अभय एवं जीविका का वरदान देने वाले हैं — उन विश्वकर्मा प्रभु का मैं आश्रय लेता हूँ।
॥ १० ॥
सर्वशिल्पप्रदातारं सर्वसौख्यविवर्धनम्।
दीनबन्धुं दयासिन्धुं विश्वकर्माणमाश्रये॥ १० ॥
अर्थ : जो संसार के समस्त शिल्पों, कलाओं, तकनीकों और उद्यमों के दाता हैं, सम्पूर्ण सुख-समृद्धि को बढ़ाने वाले हैं, दीन-दुखियों के परम बन्धु और अगाध करुणा के समुद्र हैं — उन भगवान् विश्वकर्मा के पावन चरणों में मैं नतमस्तक होता हूँ।
॥ फलश्रुतिः ॥
॥ ११ ॥
विश्वकर्माष्टकं पुण्यं यः पठेच्छ्रद्धयान्वितः।
शिल्पविद्यां लभेच्छीघ्रं वास्तुदोषो विनश्यति॥ ११ ॥
अर्थ : जो भी श्रद्धालु पुरुष अथवा नारी इस परम पावन 'विश्वकर्माष्टकम्' का नित्य श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, उसे शीघ्र ही शिल्प, तकनीक एवं विद्या में असाधारण सफलता प्राप्त होती है तथा उसके भवन व कर्मक्षेत्र का समस्त वास्तुदोष नष्ट हो जाता है।
॥ १२ ॥
धनधान्यसमृद्धिं च पुत्रपौत्रप्रवर्धनम्।
सर्वसिद्धिं लभेन्मर्त्यो विश्वकर्मप्रसादतः॥ १२ ॥
अर्थ : भगवान् विश्वकर्मा की कृपा से साधक के घर में धन, धान्य और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है, कुल और यश का विस्तार होता है, और मनुष्य इस लोक में समस्त कार्यों में सिद्धि प्राप्त कर अन्त में परम गति को प्राप्त करता है।
॥ इति श्रीविश्वकर्माष्टकं सम्पूर्णम् ॥
॥ ॐ श्री विश्वकर्मणे नमः ॥