॥ श्रीहरिः ॥
विश्वकर्मा सूक्तम्

विश्वकर्मा सूक्तम्

ऋग्वेद (मण्डल १०, सूक्त ८१ एवं ८२)

🔥 वेद

ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त ८१ एवं ८२ से उद्धृत यह सूक्त भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्माण्ड के एकमात्र परम स्रष्टा, सर्वद्रष्टा (विश्वतश्चक्षु) एवं हिरण्यगर्भ के रूप में निरूपित करने वाला आधारभूत वैदिक स्तवन है।

विश्वकर्मा सूक्तम्

ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त ८१ एवं ८२ से उद्धृत यह सूक्त भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्माण्ड के एकमात्र परम स्रष्टा, सर्वद्रष्टा (विश्वतश्चक्षु) एवं हिरण्यगर्भ के रूप में निरूपित करने वाला आधारभूत वैदिक स्तवन है।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
॥ अथ ऋग्वेदोक्तं विश्वकर्मा सूक्तम् ॥
ॐ अस्य श्रीविश्वकर्मसूक्तस्य भौवनो विश्वकर्मा ऋषिः, विश्वकर्मा देवता, १, २, ४, ५, ६, ७, ८-१४ मन्त्राणां त्रिष्टुप्, ३ मन्त्रस्य जगती छन्दः, श्रीविश्वकर्म-प्रीत्यर्थे जपे पाठे च विनियोगः।
॥ प्रथम भागः — ऋग्वेद मण्डल १०, सूक्त ८१ ॥
(सृष्टि-रचना, विश्वतश्चक्षु स्वरूप एवं जगत्-यज्ञ निरूपण)
॥ १ ॥
य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वदृषिर्होता न्यषीदत्पिता नः।
स आशिषा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छदवरॉं आविवेश॥ १ ॥
अर्थ : हमारे परम पिता परमेश्वर विश्वकर्मा, जो ज्ञानवान् ऋषि और सृष्टि-यज्ञ के मूल होता (हवनकर्ता) हैं, उन्होंने इन सम्पूर्ण भुवनों को अपने संकल्प-यज्ञ में आहूत (प्रकट) करते हुए सृष्टि-पीठ पर आसीन हुए। वे अपनी मंगलमयी इच्छा (आशीर्वाद) से समस्त ऐश्वर्य एवं प्रजा को धारण करने की अभिलाषा करते हुए, प्रारम्भ में अव्यक्त रहकर फिर पश्चाद्वर्ती सम्पूर्ण प्रपंच में व्यापक होकर प्रविष्ट हो गए।
॥ २ ॥
किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित्कथासीत्।
यतो भूमिं जनयन्विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन्महिना विश्वचक्षाः॥ २ ॥
अर्थ : जब सर्वद्रष्टा विश्वकर्मा ने अपनी अपरिमित महिमा से इस पृथिवी को उत्पन्न किया और अन्तरिक्ष तथा द्युलोक को सब ओर से आच्छादित (विस्तारित) किया, तब उस रचना का आधार (अधिष्ठान) क्या था? उसका उपादान-कारण क्या था और वह सृष्टि-विधान किस प्रकार सम्पन्न हुआ? (भावार्थ यह है कि वे परमात्मा स्वयंप्रतिष्ठित और स्वयं ही उपादान व निमित्त कारण हैं)।
॥ ३ ॥
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्।
सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः॥ ३ ॥
अर्थ : वह अद्वितीय परमदेव विश्वकर्मा सब ओर नेत्रों वाले (सर्वद्रष्टा), सब ओर मुखों वाले (सर्वव्यापक वक्ता), सब ओर भुजाओं वाले (अनन्त पराक्रमी) और सब ओर चरणों वाले (सर्वत्र गमनशील) हैं। वे एक ही परमात्मा द्यावा-पृथिवी (द्युलोक और भूलोक) को रचते हुए अपनी दोनों भुजाओं और वायु रूपी पंखों से धमन (अग्नि प्रज्वलित कर तपाने वाले शिल्पी की भांति संचरण) करते हैं।
॥ ४ ॥
किं स्विद्वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तद्यदध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन्॥ ४ ॥
अर्थ : हे बुद्धिमान् मुनियों! अपने मन में विचार करके पूछो कि वह कौन-सा वन और कौन-सा वृक्ष था, जिसकी लकड़ी से शिल्पी की तरह उन्होंने इस द्यावा-पृथिवी को तराशा? और वे सम्पूर्ण भुवनों को धारण करते हुए किस स्थान पर अधिष्ठित थे? (अर्थात् प्रकृति और ब्रह्म के मूल को जानो, जहाँ से यह विश्व आकार लेता है)।
॥ ५ ॥
या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा।
शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधावः स्वयं यजस्व तन्वं वृधानः॥ ५ ॥
अर्थ : हे अन्न-समृद्धि से युक्त सर्वेश्वर विश्वकर्मा! आपके जो परम (उत्कृष्ट), अवम (निम्न) और मध्यम लोक व स्वरूप हैं, उन सबको इस यज्ञ में अपने सखा भक्तों को समझाइए और सिखाइए। आप अपने स्वरूप का विस्तार करते हुए स्वयं ही इस सृष्टि-यज्ञ में यजन कीजिए।
॥ ६ ॥
विश्वकर्मन्हविषा वावृधानः स्वयं यजस्व पृथिवीमुत द्याम्।
मुह्यन्त्वन्ये अभितो जनास इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु॥ ६ ॥
अर्थ : हे विश्वकर्मा! हविष्य से संवर्धित होते हुए आप स्वयं ही पृथिवी और द्युलोक का यजन (सृजन) कीजिए। जो अज्ञानी जन आपके स्वरूप को नहीं जानते, वे भले ही मोहग्रस्त रहें; किन्तु हमारे यहाँ तो ऐश्वर्यशाली मघवा (इन्द्र/परमात्मा) ही प्रज्ञावान् मार्गदर्शक बनें।
॥ ७ ॥
वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे अद्या हुवेम।
स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा॥ ७ ॥
अर्थ : हम आज अपनी रक्षा एवं संवर्धन के लिए वाणी के स्वामी, मन के समान तीव्र गति वाले भगवान् विश्वकर्मा का आह्वान करते हैं। वे कल्याणकारी कर्म करने वाले, सम्पूर्ण विश्व को सुख प्रदान करने वाले परमात्मा हमारे समस्त आह्वानाें और हवनों को प्रीतिपूर्वक स्वीकार करें।
॥ द्वितीय भागः — ऋग्वेद मण्डल १०, सूक्त ८२ ॥
(परमपिता, नामधा, हिरण्यगर्भ एवं सृष्टि-रहस्य निरूपण)
॥ ८ ॥
चक्षुषः पिता मनसा हि धीरो घृतमेने अजनन्नम्नमाने।
यदेदन्ता अददृहन्त पूर्व आदिद्द्यावापृथिवी अप्रथेताम्॥ ८ ॥
अर्थ : सम्पूर्ण इन्द्रियों (नेत्रों) के मूल जनक, मननशील एवं परम धैर्यवान् विश्वकर्मा ने जब परस्पर झुकी हुई (सम्मिलित) द्यावा-पृथिवी की रचना की, तब उन्होंने उसमें स्नेह-सार (घृत रूपी जीवन रस) का संचार किया। जब उनके पूर्व भाग दृढ़ हो गए, तब वे द्युलोक और पृथिवी विस्तृत होकर सुव्यवस्थित रूप से फैल गए।
॥ ९ ॥
विश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत संदृक्।
तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन्पर एकमाहुः॥ ९ ॥
अर्थ : भगवान् विश्वकर्मा विशेष मन (सर्वज्ञ बुद्धि) वाले, सर्वव्यापक आकाश-स्वरूप, धारणकर्ता, विधानकर्ता और सबके परम द्रष्टा हैं। वे जिन सप्तऋषियों से भी परे 'एक' कहे जाते हैं, वहीं उन ज्ञानी पुरुषों के अभीष्ट मनोरथ दिव्य अन्न और आनन्द के साथ तृप्त होते हैं।
॥ १० ॥
यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।
यो देवानां नामधा एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्त्यन्या॥ १० ॥
अर्थ : जो हमारे जनक (पिता), उत्पादक और कर्मफल के विधाता हैं; जो समस्त लोकों और सम्पूर्ण भुवनों के गूढ़ रहस्यों को जानते हैं; जो अकेले ही समस्त देवों के नामों को धारण करने वाले (एकमेवाद्वितीयम्) हैं — अन्य समस्त भुवन और जिज्ञासु जन उन्हीं परम तत्त्व के विषय में जिज्ञासा करते हुए उनकी शरण में जाते हैं।
॥ ११ ॥
त आयजन्त द्रविणं समस्मा ऋषयः पूर्वे जरितारो न भूना।
असूर्ते सूर्ते रजसि निषत्ते ये भूतानि समकृण्वन्निमानि॥ ११ ॥
अर्थ : प्राचीन काल के ऋषियों ने स्तोताओं के समान प्रचुरता के साथ उन विश्वकर्मा के लिए आत्म-समर्पण रूपी ऐश्वर्य अर्पित किया — जिन ऋषियों ने व्यक्त और अव्यक्त लोक में स्थित होकर इन समस्त प्राणियों और तत्त्वों का विस्तार किया।
॥ १२ ॥
परो दिवा पर एना पृथिव्या परो देवेभिरसुरैर्यदस्ति।
कं स्विद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र देवाः समपश्यन्त विश्वे॥ १२ ॥
अर्थ : जो इस द्युलोक से परे है, इस पृथिवी से परे है, और देवों तथा असुरों से भी सर्वथा परे है — वह पहला कौन-सा गर्भ (हिरण्यगर्भ बीज) था, जिसे आदि-कारण जल ने सर्वप्रथम धारण किया, जिसमें सभी देवों ने एक साथ दर्शन किए?
॥ १३ ॥
तमिद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र देवाः समगच्छन्त विश्वे।
अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन्विश्वानि भुवनानि तस्थुः॥ १३ ॥
अर्थ : प्रलयकालीन कारण-जल ने उसी एक बीज-गर्भ को सर्वप्रथम धारण किया, जिसमें समस्त देवगण एकीभूत होकर समाविष्ट थे। उस अजन्मा (अज) विश्वकर्मा की नाभि-कमल पर वह एक अद्वितीय मूल-तत्त्व अर्पित (स्थापित) था, जिसमें सम्पूर्ण भुवन और ब्रह्माण्ड आश्रित होकर स्थित हैं।
॥ १४ ॥
न तं विदाथ य इमा जजानान्यद्युष्माकमन्तरं बभूव।
नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप उक्थशासश्चरन्ति॥ १४ ॥
अर्थ : तुम उस परमात्मा को यथार्थतः नहीं जान पा रहे हो, जिसने इन सम्पूर्ण लोकों को उत्पन्न किया है; क्योंकि तुम्हारे और उसके बीच अज्ञान का अन्तर (पर्दा) आ गया है। कोहरे (अविद्या) से ढके हुए, व्यर्थ प्रलाप करने वाले और केवल अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने में लीन रहने वाले मनुष्य केवल बाह्य मन्त्र-पाठ करते हुए संसार में भटकते रहते हैं। (अतः आत्मज्ञान और कर्म-कौशल से ही उन आदि-शिल्पी विश्वकर्मा का साक्षात्कार सम्भव है)।
॥ इति ऋग्वेदीयं विश्वकर्मा सूक्तं सम्पूर्णम् ॥
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥