॥ श्रीहरिः ॥
गंगा स्तोत्रम्

गंगा स्तोत्रम्

आदिशङ्कराचार्य

🌸 स्तोत्र

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य विरचित यह स्तोत्र पतित-पावनी, भागीरथी माँ गंगा की स्तुति में है। इसके पाठ से पाप-ताप का शमन, मन की निर्मलता तथा मोक्ष-दायिनी गंगा की अनुकम्पा प्राप्त होती है।

गंगा स्तोत्रम्

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य विरचित यह स्तोत्र पतित-पावनी, भागीरथी माँ गंगा की स्तुति में है। इसके पाठ से पाप-ताप का शमन, मन की निर्मलता तथा मोक्ष-दायिनी गंगा की अनुकम्पा प्राप्त होती है।

॥ श्रीगङ्गादेव्यै नमः ॥
॥ अथ श्री गङ्गा स्तोत्रम् ॥
ॐ अस्य श्रीगङ्गास्तोत्रस्य आदिशङ्कराचार्य ऋषिः, श्रीगङ्गा देवता, पज्झटिका छन्दः, श्रीगङ्गा-प्रीत्यर्थे सर्वपापक्षयार्थे जपे पाठे च विनियोगः।
॥ १ ॥
देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे।
शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले॥ १ ॥
अर्थ : हे देवेश्वरि! हे भगवती गङ्गे! तीनों लोकों को तारने वाली, चंचल तरंगों वाली, भगवान् शंकर के मस्तक की जटाओं में विहार करने वाली, और परम निर्मल स्वरूप वाली हे गङ्गे! मेरी बुद्धि सदा आपके पावन चरणकमलों में लगी रहे।
॥ २ ॥
भागीरथि सुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः।
नाहं जाने तव महिमानं त्राहि कृपामयि मामज्ञानम्॥ २ ॥
अर्थ : महाराज भगीरथ को आनन्द देने वाली हे माता भागीरथी! आपके जल की अपार महिमा वेदों में प्रसिद्ध है। मैं आपके उस असीम माहात्म्य को नहीं जानता; अतः हे करुणामयी माँ! मुझ अज्ञानी बालक की समस्त भयों से रक्षा कीजिए।
॥ ३ ॥
हरिपदपद्मतरङ्गिणि गङ्गे हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे।
दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम्॥ ३ ॥
अर्थ : भगवान् श्रीहरि के चरणकमलों से निकलने वाली हे गङ्गे! हिम, चन्द्रमा और मोतियों के समान धवल (उज्ज्वल) तरंगों वाली माँ! मेरे पापों के भारी भार को दूर कर दीजिए, और अपनी अहैतुकी कृपा से मुझे इस भवसागर से पार उतार दीजिए।
॥ ४ ॥
तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम्।
मातर्गङ्गे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः॥ ४ ॥
अर्थ : जिसने आपके निर्मल जल का एक बूँद भी आचमन कर लिया, निश्चय ही उसने परमपद (मोक्ष) को पा लिया। हे माता गङ्गे! जो आपका अनन्य भक्त है, यमराज भी उसकी ओर आँख उठाकर देखने में असमर्थ हैं।
॥ ५ ॥
पतितोद्धारिणि जाह्नवि गङ्गे खण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे।
भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये॥ ५ ॥
अर्थ : पतितों का उद्धार करने वाली हे जाह्नवी गङ्गे! हिमालय के विशाल शिखरों को विदीर्ण कर अपनी चंचल तरंगों से शोभा पाने वाली, पितामह भीष्म को जन्म देने वाली, महर्षि जह्नु की कन्या, और तीनों लोकों में परम धन्य हे गङ्गे! आप मेरा उद्धार कीजिए।
॥ ६ ॥
कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके।
पारावारविहारिणि गङ्गे विमुखयुवतिकृततरलतरङ्गे॥ ६ ॥
अर्थ : संसार में कल्पलता के समान मनोवांछित फल देने वाली हे गङ्गे! जो मनुष्य आपको भक्तिपूर्वक प्रणाम करता है, वह कभी शोक में नहीं पड़ता। समुद्र में जाकर मिलने वाली हे गङ्गे! अपनी निर्मल तरंगों से आप सबका मन मोह लेती हैं।
॥ ७ ॥
तव चेन्मातः स्रोतःस्नातः पुनरपि जठरे सोऽपि न जातः।
नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे॥ ७ ॥
अर्थ : हे माते! जो मनुष्य आपकी पावन धारा में स्नान कर लेता है, वह फिर कभी माता के गर्भ (पुनर्जन्म के चक्र) में नहीं आता। नरकों का निवारण करने वाली, पापों का नाश करने वाली और सर्वोच्च महिमा वाली हे जाह्नवी गङ्गे! आपको प्रणाम है।
॥ ८ ॥
पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गे जय जय जाह्नवि करुणामपाङ्गे।
इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये॥ ८ ॥
अर्थ : पवित्र तरंगों वाली, करुणाभरी दृष्टि वाली हे जाह्नवी! आपकी जय हो, जय हो! देवराज इन्द्र के मुकुट की मणियों से जिनके चरण पूजित होते हैं, जो सुख देने वाली, शुभ करने वाली और सेवकों को शरण देने वाली हैं — उन माँ गङ्गा की जय हो!
॥ ९ ॥
रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम्।
त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे॥ ९ ॥
अर्थ : हे भगवती! मेरे रोग, शोक, तीनों ताप, सम्पूर्ण पाप और दुर्बुद्धि के समूह को हर लीजिए। तीनों लोकों के सारतत्त्व और पृथ्वी के सुन्दर हार के समान शोभा पाने वाली हे गङ्गे! इस संसार-सागर में वास्तव में केवल आप ही मेरी एकमात्र परम गति हैं।
॥ १० ॥
अलकानन्दे परमानन्दे कुरु मयि करुणां कातरवन्द्ये।
तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुण्ठे तस्य निवासः॥ १० ॥
अर्थ : हे अलकनन्दा! हे परमानन्दमयी! दीन-दुःखी जनों द्वारा वन्दनीया हे माता! मुझ पर अपनी करुणा कीजिए। आपके पावन तट के निकट जिसका वास है, उसका निवास निश्चय ही साक्षात् वैकुण्ठ में ही है।
॥ ११ ॥
वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः।
अथवा श्वपचो मलिनो दीनो न च तव दूरे नृपतिकुलीनाः॥ ११ ॥
अर्थ : आपके पावन जल में कछुआ अथवा मछली होना श्रेष्ठ है, अथवा आपके तट पर रहने वाला दीन प्राणी होना भी उत्तम है; किन्तु आपके पावन तट से दूर रहकर महलों में रहने वाला उच्च कुलीन राजा होना भी किसी काम का नहीं!
॥ १२ ॥
भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये।
गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम्॥ १२ ॥
अर्थ : हे भुवनेश्वरी! हे पुण्यमयी! हे धन्य द्रवमयी देवी! हे जह्नुमुनि की कन्या! जो मनुष्य आपके इस निर्मल स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, वह संसार में सदा विजयी होता है — यह सर्वथा सत्य है।
॥ १३ ॥
येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः।
मधुराकान्तापज्झटिकाभिः परमानन्दकलितललिताभिः॥ १३ ॥
अर्थ : जिनके हृदय में माँ गङ्गा की अनन्य भक्ति है, उन्हें सदा सुख और मुक्ति सहज ही प्राप्त हो जाती है। इस मधुर, मनोहर और परमानन्द देने वाले पज्झटिका छन्द में रचित स्तोत्र द्वारा माँ गङ्गा का नित्य चिन्तन करना चाहिए।
॥ १४ ॥
गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारं वाञ्छितफलदं विमलं सारम्।
शङ्करसेवकशङ्कररचितं पठति सुखी स्तव इति च समाप्तम्॥ १४ ॥
अर्थ : भगवान् शंकर के अनन्य सेवक श्रीमद् आदिशङ्कराचार्य द्वारा रचित, समस्त मनोवांछित फल देने वाले, संसार के सारभूत इस परम पवित्र गङ्गा स्तोत्र का पाठ करने वाला मनुष्य परम सुखी होता है।
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीगङ्गास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥