॥ श्रीहरिः ॥
आरती श्री कामदनाथ जी की

आरती श्री कामदनाथ जी की

परम्परागत

🪔 आरती

चित्रकूट धाम में कामदगिरि पर्वत की पंचकोशी परिक्रमा के चारों द्वारों (प्रथम द्वार, द्वितीय द्वार, तृतीय द्वार, चतुर्थ द्वार) पर नित्य गाई जाने वाली यह परम पावन आरती भगवान कामतानाथ जी के अनुपम स्वरूप, भोग-प्रसाद, चार फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) और तीनों तापों के शमन का गुणगान करती है।

आरती श्री कामदनाथ जी की

चित्रकूट धाम में कामदगिरि पर्वत की पंचकोशी परिक्रमा के चारों द्वारों (प्रथम द्वार, द्वितीय द्वार, तृतीय द्वार, चतुर्थ द्वार) पर नित्य गाई जाने वाली यह परम पावन आरती भगवान कामतानाथ जी के अनुपम स्वरूप, भोग-प्रसाद, चार फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) और तीनों तापों के शमन का गुणगान करती है।

॥ श्री कामदनाथाय नमः ॥
॥ आरती श्री कामदनाथ जी की ॥
(चित्रकूट धाम — कामदगिरि परिक्रमा)
॥ १ ॥
आरती श्री कामदनाथ हरे, स्वामी कामदनाथ हरे।
अगम अनादि अगोचर पर्वत रूप धरे॥ ॐ जय कामदनाथ हरे॥
॥ २ ॥
श्यामल मूर्ति मनोहर शीश मुकुट साजे।
कोमल कंज बदन पर पीताम्बर राजे॥ ॐ जय कामदनाथ हरे॥
॥ ३ ॥
शोभ सुभग सिंहासन कनक छत्रधारी।
सुन्दर से दोउ नैना अनुपम अविकारी॥ ॐ जय कामदनाथ हरे॥
॥ ४ ॥
श्री फल माखन मिश्री दूध दही मेवा।
विविध प्रसाद विविध विधि पावें नर देवा॥ ॐ जय कामदनाथ हरे॥
॥ ५ ॥
चार द्वार के दर्शन जो जन कर आयें।
कामदनाथ कृपा से चारों फल पायें॥ ॐ जय कामदनाथ हरे॥
॥ ६ ॥
सुर संगीत सजाकर, आरति गान करें।
पावन रज चरणामृत पाकर पान करें॥ ॐ जय कामदनाथ हरे॥
॥ ७ ॥
कामदगिरी के दर्शन जन जन हितकारी।
दैहिक दैविक भौतिक ताप हरें भारी॥ ॐ जय कामदनाथ हरे॥
॥ ८ ॥
आरती जो कोई नर-नारी नित गावै।
कहत दास जन कामद मनवांछित पावै॥ ॐ जय कामदनाथ हरे॥
॥ इति श्री कामदनाथ जी की आरती सम्पूर्णा ॥
॥ जय कामतानाथ जी की जय ॥
॥ जय कामदगिरि सरकार की जय ॥
॥ जय चित्रकूट धाम की जय ॥