॥ श्रीहरिः ॥
श्री कामतानाथ स्तुति

श्री कामतानाथ स्तुति

परम्परागत / गोस्वामी तुलसीदास

🌸 स्तोत्र

चित्रकूट धाम का सर्वोपरि आध्यात्मिक केन्द्र 'कामदगिरि' (कामतानाथ जी) पर्वत है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने माता सीता और लक्ष्मणजी सहित अपने वनवास काल के साढ़े ग्यारह वर्ष इसी पावन पर्वत के अंचल में व्यतीत किए थे। मान्यता है कि कामदगिरि साक्षात् श्रीराम का ही विग्रह स्वरूप है, जो भक्तों की समस्त मनोकामनाओं (कामद) को पूर्ण करता है। इस संग्रह में प्राचीन संस्कृत ध्यान-श्लोक, श्रीरामचरितमानस के चित्रकूट-वन्दन दोहे एवं विनयपत्रिका का चित्रकूट-पद सम्मिलित है।

श्री कामतानाथ स्तुति

चित्रकूट धाम का सर्वोपरि आध्यात्मिक केन्द्र 'कामदगिरि' (कामतानाथ जी) पर्वत है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने माता सीता और लक्ष्मणजी सहित अपने वनवास काल के साढ़े ग्यारह वर्ष इसी पावन पर्वत के अंचल में व्यतीत किए थे। मान्यता है कि कामदगिरि साक्षात् श्रीराम का ही विग्रह स्वरूप है, जो भक्तों की समस्त मनोकामनाओं (कामद) को पूर्ण करता है। इस संग्रह में प्राचीन संस्कृत ध्यान-श्लोक, श्रीरामचरितमानस के चित्रकूट-वन्दन दोहे एवं विनयपत्रिका का चित्रकूट-पद सम्मिलित है।

॥ श्री कामतानाथाय नमः ॥
॥ श्री कामतानाथ स्तुति एवं चित्रकूट माहात्म्य ॥
चित्रकूट धाम स्थित पवित्र कामदगिरि पर्वत की पंचकोशी परिक्रमा से पूर्व एवं पश्चात कामतानाथ जी की स्तुति का विधान है, जो दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों का शमन कर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों फल प्रदान करती है।
॥ कामतानाथ ध्यान श्लोक ॥
॥ १ ॥
कामतानाथस्वामिन् जयतु सर्वकामदः।
चित्रकूटाद्रिमध्ये ते भक्तानां नित्यसिद्धिदः॥ १ ॥
अर्थ : हे सर्वकामनाओं को पूर्ण करने वाले कामतानाथ स्वामी! आपकी सदा जय हो। आप चित्रकूट पर्वत के मध्य में विराजमान होकर अपने शरणागत भक्तों को नित्य सिद्धि और कल्याण प्रदान करते हैं।
॥ श्रीरामचरितमानस — चित्रकूट माहात्म्य ॥
(महर्षि वाल्मीकि — श्रीराम संवाद)
॥ २ ॥
चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहं तुम्हार सब भाँति सुपासू॥
सैतु बंधु सरि मंजुल मीना। कामद हहिं मन वांछित देई। बंदहुँ कामदगिरि सुख सेई॥ २ ॥
अर्थ : (महर्षि वाल्मीकि प्रभु श्रीराम से कहते हैं): हे रघुनन्दन! आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिए, वहाँ आपके रहने के लिए सब प्रकार से उत्तम सुविधा और शान्ति है। यह कामदगिरि पर्वत समस्त मनोवांछित फलों को देने वाला है, अतः सब सुखों की प्राप्ति के लिए इस पावन पर्वत की वन्दना कीजिए।
॥ गोस्वामी तुलसीदास कृत चित्रकूट पद ॥
(विनयपत्रिका — पद २४)
॥ ३ ॥
अब चित चेति चित्रकूटहि चलु।
कोपित कलि, लोपित मङ्गल मगु, बिलसत बढ़त मोह-माया-मलु॥ ३ ॥
अर्थ : हे मन! अब सचेत होकर चित्रकूट की ओर चल। इस कलिकाल में मंगलमय धर्म-मार्ग लुप्त हो गया है और मोह-माया का मैल चारों ओर बढ़ रहा है।
॥ ४ ॥
करम-सूल कुलिसनि परिहरि, सब सुख-साधन सनेह-सुफलु।
तुलसीदास प्रभु-पद-पङ्कज भजु, तजि प्रपञ्च कामदगिरि-थलु॥ ४ ॥
अर्थ : इसलिए कर्मों के कठोर शूलों और दुःखों को त्यागकर, समस्त सुखों के सार और प्रभु-प्रेम के फल को प्राप्त करने के लिए — हे तुलसीदास! सांसारिक प्रपंचों को छोड़कर कामदगिरि की पावन भूमि पर श्रीराम के चरणकमलों का भजन कर।
॥ ५ ॥
कामदगिरि सम तीरथ नाहीं। जे जन जाहिं राम दरसाहीं॥
पाप कोटि कटि जाहिं क्षणेना। कामतानाथ कृपा करि देना॥ ५ ॥
अर्थ : कामदगिरि पर्वत के समान कोई दूसरा तीर्थ नहीं है, जहाँ जाने वाले भक्तों को साक्षात् श्रीराम के दर्शन की अनुभूति होती है। करोड़ों पाप क्षण भर में कट जाते हैं जब करुणामय भगवान् कामतानाथ अपनी कृपा दृष्टि प्रदान करते हैं।
॥ इति श्री कामतानाथ स्तुति सम्पूर्णा ॥
॥ जय कामदगिरि सरकार की जय ॥