॥ श्रीहरिः ॥
श्री राम प्राकट्य वंदना (भए प्रगट कृपाला)

श्री राम प्राकट्य वंदना (भए प्रगट कृपाला)

गोस्वामी तुलसीदास

🌸 स्तोत्र

गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में चैत्र शुक्ल नवमी (रामनवमी) के पावन मध्याह्न काल में कौशल्यानन्दन प्रभु श्रीराम के दिव्य प्राकट्य पर उच्चरित यह स्तुति सनातन जगत का सर्वाधिक लोकप्रिय जन्मोत्सव मंगलाचरण है। इसमें भगवान के चतुर्भुज दिव्य स्वरूप से बाल-रूप धारण करने की अलौकिक लीला का हृदयस्पर्शी वर्णन है।

श्री राम प्राकट्य वंदना (भए प्रगट कृपाला)

गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में चैत्र शुक्ल नवमी (रामनवमी) के पावन मध्याह्न काल में कौशल्यानन्दन प्रभु श्रीराम के दिव्य प्राकट्य पर उच्चरित यह स्तुति सनातन जगत का सर्वाधिक लोकप्रिय जन्मोत्सव मंगलाचरण है। इसमें भगवान के चतुर्भुज दिव्य स्वरूप से बाल-रूप धारण करने की अलौकिक लीला का हृदयस्पर्शी वर्णन है।

॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ अथ श्री राम प्राकट्य वंदना ॥
(श्रीरामचरितमानस — बालकाण्ड)
॥ १ ॥
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥ १ ॥
अर्थ : दीनों पर दया करने वाले, कौशल्याजी के परम हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियों के मनों को हरने वाले उनके इस अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्ष से गद्गद हो गईं। नेत्रों को परम आनन्द देने वाला, नवीन मेघ के समान श्यामल शरीर, चारों भुजाओं में अपने दिव्य आयुध (शंख, चक्र, गदा, पद्म), विविध आभूषण, वनमाला और कमल सदृश विशाल नयन धारण किए हुए दैत्य खर के शत्रु प्रभु शोभा के अथाह समुद्र हैं।
॥ २ ॥
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥ २ ॥
अर्थ : माता दोनों हाथ जोड़कर कहने लगीं — हे अनन्त! मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? वेद और पुराण आपको माया, तीनों गुणों और सांसारिक ज्ञान से अतीत तथा असीम बतलाते हैं। श्रुतियाँ और संतजन जिन्हें करुणा व सुख का सागर और समस्त कल्याणकारी गुणों का धाम गाते हैं, वही भक्तों से अनुराग रखने वाले लक्ष्मीपति प्रभु मेरे कल्याण के लिए आज मेरे सम्मुख प्रकट हुए हैं।
॥ ३ ॥
ब्रह्मांड निकाया निरमित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥ ३ ॥
अर्थ : वेद कहते हैं कि जिनके प्रत्येक रोम में माया द्वारा रचे हुए अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह स्थित हैं; वही प्रभु मेरे गर्भ में रहे — यह बात सुनने पर धीर पुरुषों की बुद्धि भी चकित हो जाती है। जब माता को यह परम तत्व-ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब प्रभु मुसकराए; वे अनेक प्रकार की बाल-लीलाएं करना चाहते थे। अतः उन्होंने पूर्व जन्म की सुंदर कथा कहकर माता को समझाया जिससे माता का उनके प्रति पुत्र-वात्सल्य प्रेम जाग्रत हो सके।
॥ ४ ॥
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अतिप्रिय सीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥ ४ ॥
अर्थ : माता की बुद्धि पुनः वात्सल्य भाव से भर गई और वे बोलीं — हे तात! इस दिव्य चतुर्भुज रूप को त्याग दीजिए और अत्यंत प्रिय स्वभाव वाली बाल-लीला कीजिए, माता के लिए यह सुख परम अनुपम है। माता के इस वचन को सुनकर देवों के स्वामी सर्वज्ञ प्रभु तुरंत नन्हे बालक बन गए और बाल-रुदन करने लगे। जो मनुष्य इस पावन चरित्र का गान करते हैं, वे श्रीहरि के परम पद को प्राप्त करते हैं और संसार रूपी अन्धे कुएँ में कभी नहीं गिरते।
॥ ५ ॥
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥
अर्थ : ब्राह्मण, गौ, देवता और संतों के कल्याण के लिए, अपनी ही स्वतंत्र इच्छा से रचे हुए दिव्य चिन्मय शरीर द्वारा, जो माया, तीनों गुणों और इन्द्रियों की पहुँच से सर्वथा परे हैं, उन सच्चिदानन्द परमात्मा ने यह मनुष्य रूप में अवतार धारण किया है।
॥ इति श्रीरामचरितमानसे बालकाण्डे रामप्राकट्यस्तुतिः सम्पूर्णा ॥