श्रीरामरक्षास्तोत्रम्
बुधकौशिक ऋषि
भगवान शिव द्वारा स्वप्न में बुधकौशिक ऋषि को उपदिष्ट 'श्रीरामरक्षास्तोत्रम्' सनातन धर्म का सर्वाधिक सिद्ध, प्रभावशाली और लोकप्रिय रक्षा-कवच है। इसमें भगवान श्रीराम के विभिन्न पावन नामों द्वारा मस्तक से लेकर चरणों तक सम्पूर्ण देह की रक्षा की प्रार्थना की गई है। इसके नित्य पाठ से भय, संकट, ग्रह-दोष और अकाल मृत्यु का निवारण होकर दीर्घायु, आरोग्य, विजय और मोक्ष की प्राप्ति होती है। चित्रकूट धाम में साधु-संतों एवं भक्तों द्वारा इसका नित्य पारायण किया जाता है।
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ अथ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥
ॐ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः, श्रीसीतारामचन्द्रो देवता, अनुष्टुप् छन्दः, सीता शक्तिः, श्रीमद्धनुष्मान् रामो बीजम्, सर्वकामसिद्धये जपे विनियोगः॥
॥ १ ॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम्॥
अर्थ :
जिनकी भुजाएं घुटनों तक लम्बी (आजानुबाहु) हैं, जिन्होंने हाथों में धनुष-बाण धारण कर रखा है, जो बद्ध पद्मासन में विराजमान हैं, जिन्होंने पीताम्बर वस्त्र धारण किए हैं, जिनके प्रसन्न नेत्र नूतन कमल-दल की होड़ करते हैं, जिनकी दृष्टि वाम अंक (गोदी) में विराजमान श्रीसीताजी के मुखकमल पर टिकी है, जिनका श्याम वर्ण सजल मेघ के समान है, जो विविध आभूषणों से देदीप्यमान हैं और मस्तक पर विशाल जटाओं का मुकुट धारण किए हैं — ऐसे भगवान् श्रीरामचन्द्रजी का ध्यान करना चाहिए।
॥ इति ध्यानम् ॥
॥ अथ स्तोत्रम् ॥
॥ २ ॥
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥ १ ॥
अर्थ :
श्रीरघुनाथजी का पावन चरित्र सौ करोड़ श्लोकों में विस्तृत है; उसका एक-एक अक्षर भी मनुष्यों के बड़े-बड़े महापापों का नाश करने वाला है।
॥ ३ ॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥ २ ॥
अर्थ :
नीले कमल के समान श्याम वर्ण वाले, कमल-नयन, जटाओं के मुकुट से सुशोभित तथा माता जानकी और लक्ष्मणजी सहित विराजमान भगवान् श्रीराम का ध्यान करके —
॥ ४ ॥
सासितूणीरधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्॥ ३ ॥
अर्थ :
खड्ग (तलवार), तरकस, धनुष और बाण हाथ में धारण करने वाले, निशाचरों (राक्षसों) का संहार करने वाले तथा अपनी लीला से संसार की रक्षा करने के लिए अवतीर्ण हुए अजन्मा और सर्वव्यापी प्रभु का ध्यान करके —
॥ ५ ॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥ ४ ॥
अर्थ :
बुद्धिमान मनुष्य को समस्त पापों का नाश करने वाले और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले इस श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करना चाहिए। श्रीरघुनाथजी मेरे सिर की रक्षा करें और दशरथ-नन्दन मेरे भाल (ललाट) की रक्षा करें।
॥ ६ ॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥ ५ ॥
अर्थ :
कौशल्यानन्दन मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा करें, विश्वामित्रजी के प्रिय मेरे कानों की रक्षा करें, यज्ञों की रक्षा करने वाले मेरी नासिका (नाक) की रक्षा करें और लक्ष्मणप्रिय मेरे मुख की रक्षा करें।
॥ ७ ॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥ ६ ॥
अर्थ :
विद्यानिधि प्रभु मेरी जिह्वा (जीभ) की रक्षा करें, भरतजी द्वारा वन्दित प्रभु मेरे कण्ठ की रक्षा करें, दिव्य आयुधों को धारण करने वाले मेरे दोनों कन्धों की और शिवजी के धनुष को तोड़ने वाले मेरी भुजाओं की रक्षा करें।
॥ ८ ॥
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥ ७ ॥
अर्थ :
सीतापति मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें, परशुरामजी को जीतने वाले मेरे हृदय की रक्षा करें, खर-दूषण का संहार करने वाले मेरे मध्य-भाग (उदर) की और जाम्बवानजी को आश्रय देने वाले मेरी नाभि की रक्षा करें।
॥ ९ ॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्॥ ८ ॥
अर्थ :
सुग्रीव के स्वामी मेरी कमर (कटि) की रक्षा करें, हनुमानजी के प्रभु मेरे दोनों नितम्बों (सक्थि) की रक्षा करें और राक्षस-कुल का विनाश करने वाले रघुकुल-श्रेष्ठ मेरे दोनों जंघाओं (ऊरु) की रक्षा करें।
॥ १० ॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः॥ ९ ॥
अर्थ :
समुद्र पर सेतु बांधने वाले मेरे दोनों घुटनों की रक्षा करें, रावण का वध करने वाले मेरी दोनों पिंडलियों (जंघाओं) की रक्षा करें, विभीषण को ऐश्वर्य देने वाले मेरे दोनों चरणों की रक्षा करें और इस प्रकार सम्पूर्ण शरीर की रक्षा श्रीराम करें।
॥ ११ ॥
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥ १० ॥
अर्थ :
जो पुण्यात्मा मनुष्य श्रीराम के बल से सम्पन्न इस रक्षा-कवच का पाठ करता है; वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान्, विजयी और विनयशील होता है।
॥ १२ ॥
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः॥ ११ ॥
अर्थ :
जो जीव पाताल, पृथ्वी अथवा आकाश में विचरण करते हैं अथवा जो छद्म वेश बनाकर गुप्त रूप से घूमते हैं; वे श्रीराम के नामों से सुरक्षित मनुष्य को देख भी नहीं सकते (उसको हानि पहुँचाना तो दूर की बात है)।
॥ १३ ॥
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥ १२ ॥
अर्थ :
'राम', 'रामभद्र' अथवा 'रामचन्द्र' — इस प्रकार नाम-स्मरण करने वाला मनुष्य पापों से लिप्त नहीं होता तथा इस लोक में सम्पूर्ण भोग और परलोक में मोक्ष प्राप्त करता है।
॥ १४ ॥
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः॥ १३ ॥
अर्थ :
सम्पूर्ण जगत को जीतने वाले इस एकमात्र 'राम' नाम रूपी महामन्त्र से सुरक्षित इस स्तोत्र को जो कण्ठ में धारण करता है (कण्ठस्थ करता है); समस्त सिद्धियाँ उसके हस्तगत (हाथ में) हो जाती हैं।
॥ १५ ॥
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्॥ १४ ॥
अर्थ :
'वज्रपञ्जर' नामक इस श्रीराम-कवच का जो स्मरण करता है; उसकी आज्ञा का सर्वत्र निर्बाध पालन होता है और वह सदा विजय तथा मंगल प्राप्त करता है।
॥ १६ ॥
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः॥ १५ ॥
अर्थ :
भगवान् शिव ने स्वप्न में बुधकौशिक ऋषि को जिस प्रकार इस श्रीरामरक्षा का आदेश दिया था; प्रातःकाल जागने पर उन्होंने इसे अक्षरशः उसी रूप में लिख दिया।
॥ १७ ॥
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः॥ १६ ॥
अर्थ :
जो कल्पवृक्षों के उपवन के समान विश्रामदायक हैं, समस्त आपत्तियों को शांत करने वाले हैं और तीनों लोकों में परम सुन्दर हैं; वे श्रीमान् भगवान् श्रीराम हमारे प्रभु हैं।
॥ १८ ॥
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥ १७ ॥
अर्थ :
जो युवावस्था से युक्त, अनुपम रूपवान्, सुकुमार होते हुए भी महाबली, कमल के समान विशाल नेत्रों वाले तथा वल्कल-वस्त्र और मृगचर्म धारण करने वाले हैं —
॥ १९ ॥
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ १८ ॥
अर्थ :
जो कन्द-मूल-फल का आहार करने वाले, जितेन्द्रिय, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं; वे राजा दशरथ के दोनों पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई (हमारी रक्षा करें)।
॥ २० ॥
शरण्यौ सर्वसत्त्वानामश्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥ १९ ॥
अर्थ :
जो समस्त प्राणियों को शरण देने योग्य हैं, समस्त धनुर्धारियों में श्रेष्ठ हैं और राक्षस-कुल का विनाश करने वाले हैं; वे रघुकुल-श्रेष्ठ दोनों भाई हमारी रक्षा करें।
॥ २१ ॥
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्॥ २० ॥
अर्थ :
जिन्होंने प्रत्यञ्चा चढ़े हुए धनुष ले रखे हैं, जो बाणों पर हाथ रखे हैं तथा अक्षय बाणों के तरकस धारण किए हुए हैं; वे श्रीराम और लक्ष्मण मेरी रक्षा के लिए मार्ग में सदा मेरे आगे-आगे चलें।
॥ २२ ॥
संनद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन् मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः॥ २१ ॥
अर्थ :
सदा सन्नद्ध, कवचधारी, खड्गधारी, धनुष-बाण धारण किए हुए युवा भगवान् श्रीराम लक्ष्मणजी सहित आगे चलते हुए हमारे मनोरथों की रक्षा करें।
॥ २३ ॥
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः॥ २२ ॥
अर्थ :
राम, दाशरथि, शूरवीर, जिनके पीछे लक्ष्मण चलते हैं ऐसे बली, ककुत्स्थवंशी, पूर्ण पुरुष, कौशल्यानन्दन, रघुकुल-श्रेष्ठ —
॥ २४ ॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः॥ २३ ॥
अर्थ :
वेदान्त द्वारा जानने योग्य, यज्ञों के स्वामी, पुराणपुरुषोत्तम, जानकीवल्लभ, श्रीसम्पन्न और अमित पराक्रम वाले —
॥ २५ ॥
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः॥ २४ ॥
अर्थ :
भगवान् के इन पावन दिव्य बत्तीस नामों का जो मेरा भक्त श्रद्धापूर्वक नित्य जप करता है; वह अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
॥ २६ ॥
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः॥ २५ ॥
अर्थ :
दूर्वादल के समान श्याम वर्ण वाले, कमल-नयन और पीताम्बरधारी भगवान् श्रीराम की जो मनुष्य इन दिव्य नामों से स्तुति करते हैं; वे जन्म-मरण के संसारी बन्धन में नहीं पड़ते।
॥ २७ ॥
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्॥ २६ ॥
अर्थ :
लक्ष्मणजी के ज्येष्ठ भ्राता, रघुकुल में श्रेष्ठ, सीतापति, परम सुन्दर, ककुत्स्थवंशी, करुणा के सागर, सद्गुणों के भण्डार, विप्रप्रिय, परम धार्मिक, राजाओं के अधिराज, सत्यप्रतिज्ञ, दशरथपुत्र, श्यामवर्ण, शान्तमूर्ति, लोकों को आनन्द देने वाले, रघुकुल के तिलक और रावण के शत्रु श्रीरामचन्द्रजी की मैं वन्दना करता हूँ।
॥ २८ ॥
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥ २७ ॥
अर्थ :
श्रीराम, कल्याणकारी रामभद्र, आनन्दकन्द रामचन्द्र, विधाता स्वरूप, रघुकुल के नाथ, सबके स्वामी और माता सीता के पति भगवान् श्रीराम को मेरा बारम्बार नमस्कार है।
॥ २९ ॥
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥ २८ ॥
अर्थ :
हे श्रीराम! हे रघुनन्दन! हे भरतजी के बड़े भाई! हे रण में शत्रुओं के लिए दुराधर्ष श्रीराम! आप ही मेरे एकमात्र शरणदाता हों।
॥ ३० ॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ २९ ॥
अर्थ :
मैं मन से श्रीरामचन्द्रजी के चरणों का स्मरण करता हूँ, वाणी से उनके चरणों का गुणगान करता हूँ, मस्तक से उनके चरणों में प्रणाम करता हूँ और उनके श्रीचरण-कमलों की शरण ग्रहण करता हूँ।
॥ ३१ ॥
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-
र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने॥ ३० ॥
अर्थ :
श्रीराम ही मेरी माता हैं, श्रीराम ही मेरे पिता हैं, श्रीराम ही मेरे स्वामी हैं और श्रीराम ही मेरे परम सखा हैं। दयालु श्रीरामचन्द्र ही मेरे सर्वस्व हैं, उनके अतिरिक्त मैं किसी अन्य को नहीं जानता, नहीं जानता, बिल्कुल नहीं जानता।
॥ ३२ ॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्॥ ३१ ॥
अर्थ :
जिनके दाहिनी ओर लक्ष्मणजी, बाईं ओर जनकनन्दिनी श्रीसीताजी और सम्मुख श्रीहनुमानजी विराजमान हैं; उन रघुनन्दन श्रीराम की मैं वन्दना करता हूँ।
॥ ३३ ॥
लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं
राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं
श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥ ३२ ॥
अर्थ :
जो सम्पूर्ण लोकों में सबसे अधिक सुन्दर हैं, युद्ध के रंगमंच पर परम धीर-वीर हैं, कमल के समान सुन्दर नेत्रों वाले हैं, रघुवंश के नाथ हैं तथा साक्षात् करुणा के स्वरूप और करुणा करने वाले हैं; उन श्रीरामचन्द्रजी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
॥ ३४ ॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥ ३३ ॥
अर्थ :
मन के समान वेग वाले, वायु के सदृश तीव्रगामी, समस्त इन्द्रियों को जीतने वाले, बुद्धिमानों में सर्वश्रेष्ठ, पवनपुत्र और वानरसेना के प्रमुख सेनापति श्रीरामदूत श्रीहनुमानजी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
॥ ३५ ॥
कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम्।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्॥ ३४ ॥
अर्थ :
कविता रूपी डाली पर बैठकर 'राम-राम' रूपी मधुर और मनोहर अक्षरों को मधुर स्वर में कूजने वाले महर्षि वाल्मीकि रूपी कोकिल (कोयल) की मैं सादर वन्दना करता हूँ।
॥ ३६ ॥
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥ ३५ ॥
अर्थ :
जो समस्त विपत्तियों का हरण करने वाले हैं, सम्पूर्ण सुख-सम्पत्तियों को प्रदान करने वाले हैं तथा तीनों लोकों के नयनों को आनन्द देने वाले हैं; उन श्रीरामचन्द्रजी को मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ।
॥ ३७ ॥
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्॥ ३६ ॥
अर्थ :
'राम-राम' का यह पावन सिंहनाद संसार (जन्म-मृत्यु) के बीजों को भून डालने वाला, समस्त सुख और सम्पदाओं का अर्जन कराने वाला तथा यमदूतों को भयभीत करके भगाने वाला है।
॥ ३८ ॥
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥ ३७ ॥
अर्थ :
राजाओं के मुकुटमणि श्रीराम सदा विजयी होते हैं, मैं रमापति श्रीराम का भजन करता हूँ। श्रीराम ने निशाचरों (राक्षसों) की विशाल सेना का विनाश किया, उन श्रीराम को नमस्कार है। श्रीराम से बढ़कर दूसरा कोई परम आश्रय नहीं है, मैं श्रीराम का दास हूँ। मेरा चित्त सदा श्रीराम में ही लीन रहे। हे राम! आप मेरा उद्धार कीजिए। (यह श्लोक संस्कृत व्याकरण की सभी आठों विभक्तियों में श्रीराम की स्तुति का अद्वितीय उदाहरण है)।
॥ ३९ ॥
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥ ३८ ॥
अर्थ :
(भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं): हे सुमुखी (वरानने)! मैं 'राम-राम-राम' इस प्रकार मनोरम रामनाम में ही नित्य रमण करता हूँ। यह एक रामनाम ही भगवान् विष्णु के सहस्र (एक हजार) नामों के समान फलदायी है।
॥ इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ ॐ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ॥