॥ श्रीहरिः ॥
श्रीरामसहस्रनाम स्तोत्रम्

श्रीरामसहस्रनाम स्तोत्रम्

श्रीमदानन्दरामायण (पार्वती-महादेव संवाद)

🌸 स्तोत्र

श्रीमदानन्दरामायण के राज्यकाण्ड (पूर्वार्धे प्रथमः सर्गः) में देवाधिदेव महादेव द्वारा जगन्माता पार्वती को उपदेशित भगवान श्रीराम के एक सहस्र (१०००) पावन नामों का यह स्तोत्र सनातन धर्म के परम कल्याणकारी एवं सर्वकामनाप्रद स्तोत्रों में मुकुटमणि है। इसमें भगवान श्रीराम के सच्चिदानन्द, परात्पर ब्रह्म, महाविष्णु, अवतारी स्वरूप, मर्यादा पुरुषोत्तम चरित्र और दिव्य लीलाओं का १,००० नामों में स्तवन किया गया है।

श्रीरामसहस्रनाम स्तोत्रम्

श्रीमदानन्दरामायण के राज्यकाण्ड (पूर्वार्धे प्रथमः सर्गः) में देवाधिदेव महादेव द्वारा जगन्माता पार्वती को उपदेशित भगवान श्रीराम के एक सहस्र (१०००) पावन नामों का यह स्तोत्र सनातन धर्म के परम कल्याणकारी एवं सर्वकामनाप्रद स्तोत्रों में मुकुटमणि है। इसमें भगवान श्रीराम के सच्चिदानन्द, परात्पर ब्रह्म, महाविष्णु, अवतारी स्वरूप, मर्यादा पुरुषोत्तम चरित्र और दिव्य लीलाओं का १,००० नामों में स्तवन किया गया है।

॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ अथ श्रीमदानन्दरामायणे श्रीरामसहस्रनामस्तोत्रम् ॥
॥ पूर्वपीठिका ॥
॥ श्रीपार्वत्युवाच ॥
॥ १ ॥
श्रोतुमिच्छामि देवेश तदहं सर्वकामदम् ।
नाम्नां सहस्रं मां ब्रूहि यदस्ति मयि ते दया ॥ २८॥
अर्थ : माता पार्वती बोलीं — हे देवेश्वर! यदि मुझ पर आपकी अहैतुकी कृपा है, तो मैं भगवान श्रीराम के समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले उन एक सहस्र (१०००) दिव्य नामों को सुनना चाहती हूँ, कृपया मुझे उनका उपदेश दीजिए।
॥ श्रीमहादेव उवाच ॥
॥ २ ॥
अथ वक्ष्यामि भो देवि रामनामसहस्रकम् ।
श‍ृणुष्वैकमनाः स्तोत्रं गुह्याद्गुह्यतरं महत् ॥ २९॥
अर्थ : भगवान शिव बोले — हे देवि! अब मैं श्रीरामचन्द्र जी के परम पावन सहस्र नामों का वर्णन करता हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर इस परम रहस्यमयी, गुह्य से भी अति गुह्य और महान स्तोत्र का श्रवण करो।
॥ ३ ॥
ऋषिर्विनायकश्चास्य ह्यनुष्टुप् छन्द उच्यते ।
परब्रह्मात्मको रामो देवता शुभदर्शने ॥ ३०॥
अर्थ : हे शुभदर्शने! इस मन्त्र के ऋषि विनायक (श्री गणेश) हैं, अनुष्टुप् इसका छन्द है, और साक्षात् परब्रह्मस्वरूप भगवान श्रीराम इसके इष्ट देवता हैं।
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीरामसहस्रनाममालामन्त्रस्य विनायक ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीरामो देवता । महाविष्णुरिति बीजम् । गुणभृन्निर्गुणो महानिति शक्तिः । सच्चिदानन्दविग्रह इति कीलकम् । श्रीरामप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
॥ अङ्गुलिन्यासः ॥
ॐ श्रीरामचन्द्राय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
सीतापतये तर्जनीभ्यां नमः ।
रघुनाथाय मध्यमाभ्यां नमः ।
भरताग्रजाय अनामिकाभ्यां नमः ।
दशरथात्मजाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
हनुमत्प्रभवे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥
॥ हृदयादिन्यासः ॥
ॐ श्रीरामचन्द्राय हृदयाय नमः ।
सीतापतये शिरसे स्वाहा ।
रघुनाथाय शिखायै वषट् ।
भरताग्रजाय कवचाय हुम् ।
दशरथात्मजाय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
हनुमत्प्रभवे अस्त्राय फट् ॥
भूर्भुवःस्वरोमिति दिग्बन्धः॥
॥ ध्यानम् ॥
॥ ४ ॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलस्पर्धि नेत्रं प्रसन्नम् ।
वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥ ३१॥
अर्थ : जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी (आजानुबाहु) हैं, जिन्होंने धनुष-बाण धारण कर रखा है, जो बद्ध पद्मासन पर विराजमान हैं, पीताम्बर धारण किए हुए हैं, जिनके प्रसन्न नयन नूतन प्रफुल्ल कमल के समान स्पर्धा करते हैं, जिनकी दृष्टि बाईं जंघा पर विराजमान भगवती सीता जी के मुखकमल पर टिकी हुई है, मेघ के समान जिनका श्याम वर्ण है, जो विविध दिव्य आभूषणों से देदीप्यमान हैं और विशाल जटाजूट धारण किए हुए हैं, उन भगवान श्रीरामचन्द्र जी का हम ध्यान करते हैं।
॥ ५ ॥
वैदेहीसहितं सुरद्रुमतले हैमे महामण्डपे
मध्ये पुष्पकमासने मणिमये वीरासने संस्थितम् ।
अग्रे वाचयति प्रभञ्जनेसुते तत्त्वं मुनिभ्यः परं
व्याख्यान्तं भरतादिभिः परिवृतं रामं भजे श्यामलम् ॥ ३२॥
अर्थ : स्वर्णमय कल्पवृक्ष के नीचे बने दिव्य महामण्डप में, पुष्पक विमान के मध्य मणियों से जड़े वीरासन पर जो विराजमान हैं, जिनके सम्मुख पवनपुत्र श्री हनुमान जी मुनियों को परम तत्त्व का श्रवण करा रहे हैं, तथा जो भरत आदि भ्राताओं से घिरे हुए उन तत्त्वों की व्याख्या कर रहे हैं, उन श्यामवर्ण भगवान श्रीराम की मैं वन्दना करता हूँ।
॥ ६ ॥
सौवर्णमण्डपे दिव्ये पुष्पके सुविराजिते ।
मूले कल्पतरोः स्वर्णपीठे सिंहाष्टसंयुते ॥ ३३॥
अर्थ : दिव्य एवं शोभायमान सुवर्ण मण्डप में, पुष्पक के मध्य, कल्पवृक्ष की छाया में अष्ट सिंहों से युक्त स्वर्ण-सिंहासन पर —
॥ ७ ॥
मृदुश्लक्ष्णतरे तत्र जानक्या सह संस्थितम् ।
रामं नीलोत्पलश्यामं द्विभुजं पीतवाससम् ॥ ३४॥
अर्थ : उस कोमल और स्निग्ध आसन पर भगवती श्रीजानकी जी के सहित विराजमान, नीले कमल के समान श्यामवर्ण, द्विभुज और पीत वस्त्रधारी भगवान श्रीराम का ध्यान करें।
॥ ८ ॥
स्मितवक्त्रं सुखासीनं पद्मपत्रनिभेक्षणम् ।
किरीटहारकेयूरकुण्डलैः कटकादिभिः ॥ ३५॥
अर्थ : जिनके मुखारविन्द पर मन्द-मन्द मुस्कान है, जो सुखपूर्वक आसीन हैं, कमलदल के समान विशाल नयनों वाले हैं, किरीट-मुकुट, कण्ठहार, भुजबन्द, कुण्डल और कंकण आदि दिव्य आभूषणों से अलंकृत हैं —
॥ ९ ॥
भ्राजमानं ज्ञानमुद्राधरं वीरासनस्थितम् ।
स्पृशन्तं स्तनयोरग्रे जानक्याः सव्यपाणिना ॥ ३६॥
अर्थ : जो दिव्य तेज से प्रकाशित हैं, ज्ञानमुद्रा धारण किए वीरासन पर सुशोभित हैं, तथा अपने दाहिने हाथ से भगवती जानकी जी के वक्षःस्थल का स्पर्श कर रहे हैं —
॥ १० ॥
वसिष्ठवामदेवाद्यैः सेवितं लक्ष्मणादिभिः ।
अयोध्यानगरे रम्ये ह्यभिषिक्तं रघूद्वहम् ॥ ३७॥
अर्थ : महर्षि वसिष्ठ, वामदेव आदि ऋषियों तथा लक्ष्मण आदि भ्राताओं द्वारा जिनकी सेवा की जा रही है, रमणीय अयोध्या नगरी में विधिवत राज्याभिषिक्त उन रघुकुलतिलक श्रीराम का —
॥ ११ ॥
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं रामनामसहस्रकम् ।
हत्याकोटियुतो वापि मुच्यते नात्र संशयः ॥ ३८॥
अर्थ : इस प्रकार ध्यान करके जो मनुष्य नित्य श्रीरामसहस्रनाम का जप करता है, वह करोड़ों ब्रह्महत्या आदि घोर पापों से भी तत्काल मुक्त हो जाता है, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है।
॥ मूल श्रीरामसहस्रनामस्तोत्रम् ॥
॥ १२ ॥
ॐ रामः श्रीमान्महाविष्णुर्जिष्णुर्देवहितावहः ।
तत्त्वात्मा तारकब्रह्म शाश्वतः सर्वसिद्धिदः ॥ ३९॥
अर्थ : रामः (आनन्दस्वरूप), श्रीमान् (शोभा-सम्पन्न), महाविष्णुः (सर्वव्यापक), जिष्णुः (विजयी), देवहितावहः (देवताओं का हितकारी), तत्त्वात्मा (तत्त्वस्वरूप), तारकब्रह्म (तारने वाले परब्रह्म), शाश्वतः (नित्य सनातन), सर्वसिद्धिदः (समस्त सिद्धियों के दाता)।
॥ १३ ॥
राजीवलोचनः श्रीमान् श्रीरामो रघुपुङ्गवः ।
रामभद्रः सदाचारो राजेन्द्रो जानकीपतिः ॥ ४०॥
अर्थ : राजीवलोचनः (कमलनयन), श्रीमान्, श्रीरामो (श्रीयुक्त राम), रघुपुङ्गवः (रघुकुलश्रेष्ठ), रामभद्रः (कल्याणमय राम), सदाचारो (सदाचारी), राजेन्द्रो (राजाधिराज), जानकीपतिः (सीताकान्त)।
॥ १४ ॥
अग्रगण्यो वरेण्यश्च वरदः परमेश्वरः ।
जनार्दनो जितामित्रः परार्थैकप्रयोजनः ॥ ४१॥
अर्थ : अग्रगण्यो (सर्वप्रथम वन्दनीय), वरेण्यश्च (सर्वश्रेष्ठ), वरदः (वरदाता), परमेश्वरः (परम नियन्ता), जनार्दनो (दुःखहर्ता), जितामित्रः (शत्रुजयी), परार्थैकप्रयोजनः (परोपकार ही जिनका एकमात्र लक्ष्य है)।
॥ १५ ॥
विश्वामित्रप्रियो दाता शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
सर्वज्ञः सर्ववेदादिः शरण्यो वालिमर्दनः ॥ ४२॥
अर्थ : विश्वामित्रप्रियो (विश्वामित्र के प्रिय), दाता (दानी), शत्रुजिच्छत्रुतापनः (शत्रुओं को जीतने और तपाने वाले), सर्वज्ञः (सर्वज्ञाता), सर्ववेदादिः (वेदों के आदि कारण), शरण्यो (शरण देने योग्य), वालिमर्दनः (बाली का उद्धार करने वाले)।
॥ १६ ॥
ज्ञानभव्योऽपरिच्छेद्यो वाग्मी सत्यव्रतः शुचिः ।
ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञः खरध्वंसः प्रतापवान् ॥ ४३॥
अर्थ : ज्ञानभव्यो (ज्ञान से शोभायमान), अपरिच्छेद्यो (असीमित), वाग्मी (उत्तम वक्ता), सत्यव्रतः (सत्यव्रती), शुचिः (परम पवित्र), ज्ञानगम्यो (ज्ञान द्वारा प्राप्य), दृढप्रज्ञः (स्थिर बुद्धि वाले), खरध्वंसः (खर-दूषण के नाशक), प्रतापवान् (परम प्रतापी)।
॥ १७ ॥
द्युतिमानात्मवान् वीरो जितक्रोधोऽरिमर्दनः ।
विश्वरूपो विशालाक्षः प्रभुः परिवृढो दृढः ॥ ४४॥
अर्थ : द्युतिमान् (तेजोमय), आत्मवान् (जितात्मा), वीरो (महापराक्रमी), जितक्रोधो (क्रोध को जीतने वाले), अरिमर्दनः (शत्रुनाशक), विश्वरूपो (विश्वरूप), विशालाक्षः (विशाल नेत्र वाले), प्रभुः (समर्थ), परिवृढो दृढः (अधिपति एवं सुदृढ़ संकल्प वाले)।
॥ १८ ॥
ईशः खड्गधरः श्रीमान् कौसल्येयोऽनसूयकः ।
विपुलांसो महोरस्कः परमेष्ठी परायणः ॥ ४५॥
अर्थ : ईशः (स्वामी), खड्गधरः (खड्गधारी), श्रीमान्, कौसल्येयो (कौसल्यानन्दन), अनसूयकः (दोषदृष्टि से रहित), विपुलांसो (विशाल कंधों वाले), महोरस्कः (विशाल वक्षःस्थल वाले), परमेष्ठी (परम पद पर स्थित), परायणः (परम आश्रय)।
॥ १९ ॥
सत्यव्रतः सत्यसन्धो गुरुः परमधार्मिकः ।
लोकेशो लोकवन्द्यश्च लोकात्मा लोककृद्विभुः ॥ ४६॥
अर्थ : सत्यव्रतः (सत्य का पालन करने वाले), सत्यसन्धो (सत्य प्रतिज्ञा वाले), गुरुः (जगद्गुरु), परमधार्मिकः (सर्वश्रेष्ठ धर्मात्मा), लोकेशो (लोकों के स्वामी), लोकवन्द्यश्च (सम्पूर्ण जगत द्वारा वन्दनीय), लोकात्मा (समस्त लोकों के आत्मस्वरूप), लोककृद्विभुः (सृष्टि के कर्ता एवं सर्वव्यापी)।
॥ २० ॥
अनादिर्भगवान् सेव्यो जितमायो रघूद्वहः ।
रामो दयाकरो दक्षः सर्वज्ञः सर्वपावनः ॥ ४७॥
अर्थ : अनादिर्भगवान् (आदिरहित षडैश्वर्यसम्पन्न), सेव्यो (सेवा योग्य), जितमायो (माया को जीतने वाले), रघूद्वहः (रघुकुल के उद्धारक), रामो दयाकरो (दयानिधान), दक्षः (सर्वकार्य कुशल), सर्वज्ञः, सर्वपावनः (सबको पवित्र करने वाले)।
॥ २१ ॥
ब्रह्मण्यो नीतिमान् गोप्ता सर्वदेवमयो हरिः ।
सुन्दरः पीतवासाश्च सूत्रकारः पुरातनः ॥ ४८॥
अर्थ : ब्रह्मण्यो (ब्राह्मण-भक्त), नीतिमान् (नीतिनिपुण), गोप्ता (रक्षक), सर्वदेवमयो (सर्वदेवस्वरूप), हरिः (पापहर्ता), सुन्दरः (अति मनोहारी), पीतवासाश्च (पीताम्बरधारी), सूत्रकारः (सृष्टिनियम के रचयिता), पुरातनः (सनातन)।
॥ २२ ॥
सौम्यो महर्षिः कोदण्डः सर्वज्ञः सर्वकोविदः ।
कविः सुग्रीववरदः सर्वपुण्याधिकप्रदः ॥ ४९॥
अर्थ : सौम्यो (शान्तमूर्ति), महर्षिः (महर्षिरूप), कोदण्डः (धनुर्धर), सर्वज्ञः, सर्वकोविदः (समस्त विद्याओं के ज्ञाता), कविः (क्रान्तदर्शी), सुग्रीववरदः (सुग्रीव को वर देने वाले), सर्वपुण्याधिकप्रदः (समस्त पुण्यों से बढ़कर फल देने वाले)।
॥ २३ ॥
भव्यो जितारिषड्वर्गो महोदारोऽघनाशनः ।
सुकीर्तिरादिपुरुषः कान्तः पुण्यकृतागमः ॥ ५०॥
अर्थ : भव्यो (कल्याणमय), जितारिषड्वर्गो (काम-क्रोधादि षड्रिपुओं के विजेता), महोदारो (परम उदार), अघनाशनः (पापनाशक), सुकीर्तिर् (पवित्र यश वाले), आदिपुरुषः (परम आदिपुरुष), कान्तः (परम कमनीय), पुण्यकृतागमः (पुण्यवानों को प्राप्त होने वाले)।
॥ २४ ॥
अकल्मषश्चतुर्बाहुः सर्वावासो दुरासदः । 100
स्मितभाषी निवृत्तात्मा स्मृतिमान् वीर्यवान् प्रभुः ॥ ५१॥
अर्थ : अकल्मषः (निष्पाप), चतुर्बाहुः (चार भुजाओं वाले), सर्वावासो (सबके निवासस्थान), दुरासदः (अजेय), स्मितभाषी (मन्द मुस्कान सहित बोलने वाले), निवृत्तात्मा (आसक्तिरहित), स्मृतिमान् (स्मृतिवान्), वीर्यवान् प्रभुः (परम शक्तिमान् प्रभु)।
॥ २५ ॥
धीरो दान्तो घनश्यामः सर्वायुधविशारदः ।
अध्यात्मयोगनिलयः सुमना लक्ष्मणाग्रजः ॥ ५२॥
अर्थ : धीरो (धैर्यवान्), दान्तो (इन्द्रियनिग्रही), घनश्यामः (मेघश्याम), सर्वायुधविशारदः (समस्त शस्त्र-विद्या में निपुण), अध्यात्मयोगनिलयः (अध्यात्मयोग के धाम), सुमना (प्रसन्नचित्त), लक्ष्मणाग्रजः (लक्ष्मण के बड़े भाई)।
॥ २६ ॥
सर्वतीर्थमयः शूरः सर्वयज्ञफलप्रदः ।
यज्ञस्वरूपो यज्ञेशो जरामरणवर्जितः ॥ ५३॥
अर्थ : सर्वतीर्थमयः (समस्त तीर्थों के स्वरूप), शूरः (वीर), सर्वयज्ञफलप्रदः (समस्त यज्ञों का फल देने वाले), यज्ञस्वरूपो (यज्ञरूप), यज्ञेशो (यज्ञ के स्वामी), जरामरणवर्जितः (जन्म, बुढ़ापा और मृत्यु से रहित)।
॥ २७ ॥
वर्णाश्रमगुरुर्वर्णी शत्रुजित्पुरुषोत्तमः ।
शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता परमात्मा परापरः ॥ ५४॥
अर्थ : वर्णाश्रमगुरुर् (वर्णाश्रम धर्म के पालक), वर्णी (ब्रह्मचारी), शत्रुजित् (शत्रुजयी), पुरुषोत्तमः (पुरुषों में उत्तम), शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता (रामेश्वर में शिवलिङ्ग की स्थापना करने वाले), परमात्मा, परापरः (कार्य-कारण रूप)।
॥ २८ ॥
प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः पूर्णः परपुरञ्जयः ।
अनन्तदृष्टिरानन्दो धनुर्वेदो धनुर्धरः ॥ ५५॥
अर्थ : प्रमाणभूतो (परम प्रमाण), दुर्ज्ञेयः (कठिनाई से जानने योग्य), पूर्णः (परिपूर्ण), परपुरञ्जयः (शत्रुनगर-विजेता), अनन्तदृष्टिर (अनन्त दृष्टि वाले), आनन्दो (आनन्दमय), धनुर्वेदो धनुर्धरः (धनुर्वेद के स्वरूप एवं श्रेष्ठ धनुर्धर)।
॥ २९ ॥
गुणाकारो गुणश्रेष्ठः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
अभिवाद्यो महाकायो विश्वकर्मा विशारदः ॥ ५६॥
अर्थ : गुणाकारो (गुणों की खान), गुणश्रेष्ठः (सर्वश्रेष्ठ गुणों वाले), सच्चिदानन्दविग्रहः (सत्-चित्-आनन्द स्वरूप), अभिवाद्यो (वन्दनीय), महाकायो (विराट् रूप), विश्वकर्मा (संसार के निर्माता), विशारदः (सर्वज्ञ)।
॥ ३० ॥
विनीतात्मा वीतरागस्तपस्वीशो जनेश्वरः ।
कल्याणः प्रह्वतिः कल्पः सर्वेशः सर्वकामदः ॥ ५७॥
अर्थ : विनीतात्मा (विनम्र स्वभाव वाले), वीतरागस् (राग-द्वेष रहित), तपस्वीशो (तपस्वियों के ईश्वर), जनेश्वरः (प्रजा के स्वामी), कल्याणः (कल्याणस्वरूप), प्रह्वतिः (शरणागत-वत्सल), कल्पः (समर्थ), सर्वेशः (सबके स्वामी), सर्वकामदः (समस्त कामनाओं के पूरक)।
॥ ३१ ॥
अक्षयः पुरुषः साक्षी केशवः पुरुषोत्तमः ।
लोकाध्यक्षो महाकार्यो विभीषणवरप्रदः ॥ ५८॥
अर्थ : अक्षयः (अविनाशी), पुरुषः (परम पुरुष), साक्षी (सर्वसाक्षी), केशवः (ब्रह्मा-विष्णु-शिव के प्रेरक), पुरुषोत्तमः, लोकाध्यक्षो (लोकों के अध्यक्ष), महाकार्यो (महान कार्य करने वाले), विभीषणवरप्रदः (विभीषण को अभय व लंका का राज्य देने वाले)।
॥ ३२ ॥
आनन्दविग्रहो ज्योतिर्हनुमत्प्रभुरव्ययः ।
भ्राजिष्णुः सहनो भोक्ता सत्यवादी बहुश्रुतः ॥ ५९॥
अर्थ : आनन्दविग्रहो (आनन्दमूर्ति), ज्योतिर् (परम प्रकाश), हनुमत्प्रभुर (श्री हनुमान जी के स्वामी), अव्ययः (अविनाशी), भ्राजिष्णुः (प्रकाशमान), सहनो (सहनशील), भोक्ता (यज्ञभोक्ता), सत्यवादी (सत्य बोलने वाले), बहुश्रुतः (वेदान्त-वेत्ता)।
॥ ३३ ॥
सुखदः कारणं कर्ता भवबन्धविमोचनः ।
देवचूडामणिर्नेता ब्रह्मण्यो ब्रह्मवर्धनः ॥ ६०॥
अर्थ : सुखदः (सुखदाता), कारणं कर्ता (सृष्टि के कारण और कर्ता), भवबन्धविमोचनः (संसार-बन्धन से छुड़ाने वाले), देवचूडामणिर् (देवताओं के मुकुटमणि), नेता (सञ्चालक), ब्रह्मण्यो (ब्रह्मनिष्ठ), ब्रह्मवर्धनः (ब्रह्मतेज की वृद्धि करने वाले)।
॥ ३४ ॥
संसारतारको रामः सर्वदुःखविमोक्षकृत् ।
विद्वत्तमो विश्वकर्ता विश्वकृद्विश्वकर्म च ॥ ६१॥
अर्थ : संसारतारको (भवसागर से पार लगाने वाले), रामः, सर्वदुःखविमोक्षकृत् (समस्त दुःखों से मुक्तिदाता), विद्वत्तमो (विद्वानों में श्रेष्ठ), विश्वकर्ता, विश्वकृद्विश्वकर्म च (विश्व के स्रष्टा और विश्वरूप कर्म वाले)।
॥ ३५ ॥
नित्यो नियतकल्याणः सीताशोकविनाशकृत् ।
काकुत्स्थः पुण्डरीकाक्षो विश्वामित्रभयापहः ॥ ६२॥
अर्थ : नित्यो (सनातन), नियतकल्याणः (सदा कल्याण करने वाले), सीताशोकविनाशकृत् (माता सीता का शोक हरने वाले), काकुत्स्थः (ककुत्स्थ के वंशज), पुण्डरीकाक्षो (कमलनयन), विश्वामित्रभयापहः (विश्वामित्र का भय दूर करने वाले)।
॥ ३६ ॥
मारीचमथनो रामो विराधवधपण्डितः ।
दुःस्वप्ननाशनो रम्यः किरीटी त्रिदशाधिपः ॥ ६३॥
अर्थ : मारीचमथनो (मारीच का मानमर्दन करने वाले), रामो, विराधवधपण्डितः (विराध का उद्धार करने में कुशल), दुःस्वप्ननाशनो (बुरे स्वप्नों का नाश करने वाले), रम्यः (मनोहर), किरीटी (मुकुटधारी), त्रिदशाधिपः (देवताओं के स्वामी)।
॥ ३७ ॥
महाधनुर्महाकायो भीमो भीमपराक्रमः ।
तत्त्वस्वरूपस्तत्त्वज्ञस्तत्त्ववादी सुविक्रमः ॥ ६४॥
अर्थ : महाधनुर् (विशाल धनुषधारी), महाकायो, भीमो (शत्रुओं के लिए भयंकर), भीमपराक्रमः (अतुलित पराक्रमी), तत्त्वस्वरूपस् (तत्त्वरूप), तत्त्वज्ञस् (तत्त्ववेत्ता), तत्त्ववादी (परमतत्त्व के उपदेशक), सुविक्रमः (सुन्दर पराक्रम वाले)।
॥ ३८ ॥
भूतात्म भूतकृत्स्वामी कालज्ञानी महावपुः ।
अनिर्विण्णो गुणग्रामो निष्कलङ्कः कलङ्कहा ॥ ६५॥
अर्थ : भूतात्मा (समस्त जीवों की आत्मा), भूतकृत् (प्राणियों के स्रष्टा), स्वामी (प्रभु), कालज्ञानी (त्रिकालज्ञ), महावपुः (विशाल स्वरूप), अनिर्विण्णो (उत्साहसम्पन्न), गुणग्रामो (गुणों के पुंज), निष्कलङ्कः (दोषरहित), कलङ्कहा (पापनाशक)।
॥ ३९ ॥
स्वभावभद्रः शत्रुघ्नः केशवः स्थाणुरीश्वरः ।
भूतादिः शंभुरादित्यः स्थविष्ठः शाश्वतो ध्रुवः ॥ ६६॥
अर्थ : स्वभावभद्रः (स्वभाव से ही कल्याणमय), शत्रुघ्नः (शत्रुनाशक), केशवः, स्थाणुर् (अचल), ईश्वरः, भूतादिः (सृष्टि के मूल), शंभुस् (कल्याणदाता शिवरूप), आदित्यः (सूर्य), स्थविष्ठः (विशालतम), शाश्वतो ध्रुवः (सदा अचल रहने वाले)।
॥ ४० ॥
कवची कुण्डली चक्री खड्गी भक्तजनप्रियः ।
अमृत्युर्जन्मरहितः सर्वजित्सर्वगोचरः ॥ ६७॥
अर्थ : कवची (कवचधारी), कुण्डली (कुण्डलधारी), चक्री (सुदर्शनधारी), खड्गी (खड्गधारी), भक्तजनप्रियः (भक्तों के प्रिय), अमृत्युर् (मृत्युंजय), जन्मरहितः (अजन्मा), सर्वजित् (सर्वविजयी), सर्वगोचरः (सर्वव्यापी)।
॥ ४१ ॥
अनुत्तमोऽप्रमेयात्मा सर्वात्मा गुणसागरः । 200
रामः समात्मा समगो जटामुकुटमण्डितः ॥ ६८॥
अर्थ : अनुत्तमो (सर्वोत्तम), अप्रमेयात्मा (अथाह महिमा वाले), सर्वात्मा (सबके आत्मस्वरूप), गुणसागरः (सद्गुणों के समुद्र), रामः, समात्मा (समदृष्टि वाले), समगो (समत्व में स्थित), जटामुकुटमण्डितः (जटाओं के मुकुट से सुशोभित)।
॥ ४२ ॥
अजेयः सर्वभूतात्मा विष्वक्सेनो महातपाः ।
लोकाध्यक्षो महाबाहुरमृतो वेदवित्तमः ॥ ६९॥
अर्थ : अजेयः (अपराजेय), सर्वभूतात्मा, विष्वक्सेनो (जिनकी सेना सर्वत्र है), महातपाः (महान तपस्वी), लोकाध्यक्षो, महाबाहुर् (विशाल भुजाओं वाले), अमृतो (अमृतरूप), वेदवित्तमः (वेदों के परम ज्ञाता)।
॥ ४३ ॥
सहिष्णुः सद्गतिः शास्ता विश्वयोनिर्महाद्युतिः ।
अतीन्द्र ऊर्जितः प्रांशुरुपेन्द्रो वामनो बलिः ॥ ७०॥
अर्थ : सहिष्णुः (क्षमाशील), सद्गतिः (सज्जनों की परम गति), शास्ता (शासक), विश्वयोनिर्महाद्युतिः (सृष्टि के उत्पत्ति-स्थान एवं महातेजस्वी), अतीन्द्र (इन्द्र से भी परे), ऊर्जितः (महाबली), प्रांशुरुपेन्द्रो वामनो बलिः (वामन रूप, उपेन्द्र और बलशाली)।
॥ ४४ ॥
धनुर्वेदो विधाता च ब्रह्मा विष्णुश्च शङ्करः ।
हंसो मरीचिर्गोविन्दो रत्नगर्भो महद्द्युतिः ॥ ७१॥
अर्थ : धनुर्वेदो, विधाता च (सृष्टि के विधाता), ब्रह्मा विष्णुश्च शङ्करः (त्रिमूर्ति स्वरूप), हंसो (परमहंस), मरीचिर् (किरणरूप), गोविन्दो (गोविन्द), रत्नगर्भो (रत्नों के आश्रय), महद्द्युतिः (दिव्य तेज वाले)।
॥ ४५ ॥
व्यासो वाचस्पतिः सर्वदर्पितासुरमर्दनः ।
जानकीवल्लभः श्रीमान् प्रकटः प्रीतिवर्धनः ॥ ७२॥
अर्थ : व्यासो (व्यास रूप), वाचस्पतिः (वाणी के स्वामी), सर्वदर्पितासुरमर्दनः (घमंडी असुरों का मानमर्दन करने वाले), जानकीवल्लभः (श्रीजानकी के प्राणप्रिय), श्रीमान्, प्रकटः (भक्तों के सम्मुख प्रकट होने वाले), प्रीतिवर्धनः (प्रेम बढ़ाने वाले)।
॥ ४६ ॥
संभवोऽतीन्द्रियो वेद्यो निर्देशो जाम्बवत्प्रभुः ।
मदनो मन्मथो व्यापी विश्वरूपो निरञ्जनः ॥ ७३॥
अर्थ : संभवो (युग-युग में अवतरित होने वाले), अतीन्द्रियो (इन्द्रियों से परे), वेद्यो (जानने योग्य), निर्देशो (आदेश देने वाले), जाम्बवत्प्रभुः (ऋक्षराज जाम्बवन्त के स्वामी), मदनो मन्मथो (कामदेव के भी सौन्दर्य को लजाने वाले), व्यापी, विश्वरूपो, निरञ्जनः (मायामुक्त)।
॥ ४७ ॥
नारायणोऽग्रणी साधुर्जटायुप्रीतिवर्धनः ।
नैकरूपो जगन्नाथः सुरकार्यहितः प्रभुः ॥ ७४॥
अर्थ : नारायणो, अग्रणी (सर्वश्रेष्ठ पथप्रदर्शक), साधुर् (संतस्वरूप), जटायुप्रीतिवर्धनः (जटायु को परम गति देने वाले), नैकरूपो (अनेकरूपधारी), जगन्नाथः (जगत के नाथ), सुरकार्यहितः प्रभुः (देवताओं का कार्य सिद्ध करने वाले समर्थ स्वामी)।
॥ ४८ ॥
जितक्रोधो जितारातिः प्लवगाधिपराज्यदः ।
वसुदः सुभुजो नैकमायो भव्यः प्रमोदनः ॥ ७५॥
अर्थ : जितक्रोधो जितारातिः (क्रोध और शत्रुओं को जीतने वाले), प्लवगाधिपराज्यदः (वानरराज सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य देने वाले), वसुदः (धनदाता), सुभुजो (सुन्दर भुजाओं वाले), नैकमायो (अनेक लीलाएँ करने वाले), भव्यः, प्रमोदनः (परमानन्द देने वाले)।
॥ ४९ ॥
चण्डांशुः सिद्धिदः कल्पः शरणागतवत्सलः ।
अगदो रोगहर्ता च मन्त्रज्ञो मन्त्रभावनः ॥ ७६॥
अर्थ : चण्डांशुः (सूर्य के समान प्रतापी), सिद्धिदः, कल्पः, शरणागतवत्सलः (शरणागतों पर वात्सल्य लुटाने वाले), अगदो (रोगरहित), रोगहर्ता च (भव-रोग एवं शारीरिक रोग हरने वाले), मन्त्रज्ञो मन्त्रभावनः (मन्त्रों के ज्ञाता एवं भावक)।
॥ ५० ॥
सौमित्रिवत्सलो धुर्यो व्यक्ताव्यक्तस्वरूपधृक् ।
वसिष्ठो ग्रामणीः श्रीमाननुकूलः प्रियंवदः ॥ ७७॥
अर्थ : सौमित्रिवत्सलो (लक्ष्मण जी पर अगाध स्नेह रखने वाले), धुर्यो (कर्तव्यपरायण), व्यक्ताव्यक्तस्वरूपधृक् (व्यक्त और अव्यक्त रूप धारण करने वाले), वसिष्ठो (वसिष्ठ के शिष्य), ग्रामणीः (अग्रणी), श्रीमान्, अनुकूलः, प्रियंवदः (सदा प्रिय बोलने वाले)।
॥ ५१ ॥
अतुलः सात्त्विको धीरः शरासनविशारदः ।
ज्येष्ठः सर्वगुणोपेतः शक्तिमांस्ताटकान्तकः ॥ ७८॥
अर्थ : अतुलः (अतुलनीय), सात्त्विको (सत्त्वगुणी), धीरः, शरासनविशारदः (धनुर्विद्या में परम कुशल), ज्येष्ठः (सर्वज्येष्ठ), सर्वगुणोपेतः (सम्पूर्ण सद्गुणों से युक्त), शक्तिमांस् (सर्वशक्तिमान्), ताटकान्तकः (ताड़का का वध करने वाले)।
॥ ५२ ॥
वैकुण्ठः प्राणिनां प्राणः कमलः कमलाधिपः ।
गोवर्धनधरो मत्स्यरूपः कारुण्यसागरः ॥ ७९॥
अर्थ : वैकुण्ठः, प्राणिनां प्राणः (समस्त जीवों के प्राण), कमलः, कमलाधिपः (महालक्ष्मी के स्वामी), गोवर्धनधरो (गोवर्धनधारी श्रीकृष्णरूप), मत्स्यरूपः (मत्स्यावतार), कारुण्यसागरः (करुणा के सागर)।
॥ ५३ ॥
कुम्भकर्णप्रभेत्ता च गोपिगोपालसंवृतः । 300
मायावी व्यापको व्यापी रेणुकेयबलापहः ॥ ८०॥
अर्थ : कुम्भकर्णप्रभेत्ता च (कुम्भकर्ण का संहार करने वाले), गोपिगोपालसंवृतः (गोप-गोपियों से घिरे श्रीकृष्णरूप), मायावी (लीलामय), व्यापको व्यापी, रेणुकेयबलापहः (परशुराम जी के तेज को समाहित करने वाले)।
॥ ५४ ॥
पिनाकमथनो वन्द्यः समर्थो गरुडध्वजः ।
लोकत्रयाश्रयो लोकभरितो भरताग्रजः ॥ ८१॥
अर्थ : पिनाकमथनो (शिवधनुष को भंग करने वाले), वन्द्यः, समर्थो, गरुडध्वजः (गरुड़ की ध्वजा वाले), लोकत्रयाश्रयो (तीनों लोकों के आश्रय), लोकभरितो (सम्पूर्ण जगत का भरण-पोषण करने वाले), भरताग्रजः (भरत के बड़े भाई)।
॥ ५५ ॥
श्रीधरः सङ्गतिर्लोकसाक्षी नारायणो विभुः ।
मनोरूपी मनोवेगी पूर्णः पुरुषपुङ्गवः ॥ ८२॥
अर्थ : श्रीधरः (श्री को धारण करने वाले), सङ्गतिर् (सत्संगरूप), लोकसाक्षी (संसार के साक्षी), नारायणो विभुः, मनोरूपी मनोवेगी (मन के समान द्रुतगामी), पूर्णः, पुरुषपुङ्गवः (पुरुषश्रेष्ठ)।
॥ ५६ ॥
यदुश्रेष्ठो यदुपतिर्भूतावासः सुविक्रमः ।
तेजोधरो धराधरश्चतुर्मूर्तिर्महानिधिः ॥ ८३॥
अर्थ : यदुश्रेष्ठो यदुपतिर् (यदुवंश के स्वामी), भूतावासः (समस्त प्राणियों के धाम), सुविक्रमः, तेजोधरो धराधरश् (पृथ्वी को धारण करने वाले वराहरूप), चतुर्मूर्तिर्महानिधिः (चार रूपों वाले एवं महान् निधि)।
॥ ५७ ॥
चाणूरमथनो वन्द्यः शान्तो भरतवन्दितः ।
शब्दातिगो गभीरात्मा कोमलाङ्गः प्रजागरः ॥ ८४॥
अर्थ : चाणूरमथनो (चाणूर का वध करने वाले), वन्द्यः, शान्तो, भरतवन्दितः (भरत जी द्वारा वन्दित), शब्दातिगो (वाणी से परे), गभीरात्मा (गम्भीर स्वभाव वाले), कोमलाङ्गः (अति सुकुमार अंगों वाले), प्रजागरः (सदा जाग्रत)।
॥ ५८ ॥
लोकोर्ध्वगः शेषशायी क्षीराब्धिनिलयोऽमलः ।
आत्मज्योतिरदीनात्मा सहस्रार्चिः सहस्रपात् ॥ ८५॥
अर्थ : लोकोर्ध्वगः (ऊर्ध्वलोकों में स्थित), शेषशायी (अनन्त शेषनाग पर शयन करने वाले), क्षीराब्धिनिलयोऽमलः (क्षीरसागर में निवास करने वाले निर्मल प्रभु), आत्मज्योतिरदीनात्मा (स्वयंप्रकाश एवं अखण्ड आत्मतेज वाले), सहस्रार्चिः सहस्रपात् (सहस्रों किरणों और सहस्रों चरणों वाले)।
॥ ५९ ॥
अमृतांशुर्महीगर्तो निवृत्तविषयस्पृहः ।
त्रिकालज्ञो मुनिः साक्षी विहायसगतिः कृती ॥ ८६॥
अर्थ : अमृतांशुर्महीगर्तो (पृथ्वी के आधार), निवृत्तविषयस्पृहः (विषय-वासनाओं से सर्वथा विरक्त), त्रिकालज्ञो (भूत-भविष्य-वर्तमान के ज्ञाता), मुनिः, साक्षी, विहायसगतिः (आकाशगामी), कृती (परम कृतार्थ)।
॥ ६० ॥
पर्जन्यः कुमुदो भूतावासः कमललोचनः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासो वीरहा लक्ष्मणाग्रजः ॥ ८७॥
अर्थ : पर्जन्यः (मेघ के समान कृपा बरसाने वाले), कुमुदो, भूतावासः, कमललोचनः, श्रीवत्सवक्षाः (वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न वाले), श्रीवासो, वीरहा (दुष्ट वीरों का संहारक), लक्ष्मणाग्रजः।
॥ ६१ ॥
लोकाभिरामो लोकारिमर्दनः सेवकप्रियः ।
सनातनतमो मेघश्यामलो राक्षसान्तकः ॥ ८८॥
अर्थ : लोकाभिरामो (सम्पूर्ण जगत को मुग्ध करने वाले), लोकारिमर्दनः (संसार के शत्रुओं का मर्दन करने वाले), सेवकप्रियः (दासों पर कृपा करने वाले), सनातनतमो (अत्यन्त पुरातन), मेघश्यामलो (सजल मेघ के समान श्याम), राक्षसान्तकः (राक्षसों के संहारक)।
॥ ६२ ॥
दिव्यायुधधरः श्रीमानप्रमेयो जितेन्द्रियः ।
भूदेववन्द्यो जनकप्रियकृत्प्रपितामहः ॥ ८९॥
अर्थ : दिव्यायुधधरः (दिव्य अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले), श्रीमान्, अप्रमेयो (तर्क से परे), जितेन्द्रियः (इन्द्रियों के विजेता), भूदेववन्द्यो (ब्राह्मणों द्वारा वन्दित), जनकप्रियकृत् (महाराज जनक का प्रिय करने वाले), प्रपितामहः (समस्त जगत के प्रपितामह)।
॥ ६३ ॥
उत्तमः सात्विकः सत्यः सत्यसन्धस्त्रिविक्रमः ।
सुवृत्तः सुगमः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ॥ ९०॥
अर्थ : उत्तमः, सात्विकः, सत्यः, सत्यसन्धस् (सत्यप्रतिज्ञ), त्रिविक्रमः (तीन पग में ब्रह्माण्ड नापने वाले), सुवृत्तः (उत्तम चरित्र वाले), सुगमः (भक्तों के लिए सहज प्राप्य), सूक्ष्मः, सुघोषः (सुन्दर गर्जना वाले), सुखदः सुहृत् (सच्चे मित्र)।
॥ ६४ ॥
दामोदरोऽच्युतः शार्ङ्गी वामनो मथुराधिपः ।
देवकीनन्दनः शौरिः शूरः कैटभमर्दनः ॥ ९१॥
अर्थ : दामोदरोऽच्युतः शार्ङ्गी (शार्ङ्ग धनुषधारी), वामनो, मथुराधिपः (मथुरा के स्वामी), देवकीनन्दनः, शौरिः (शूरसेन के वंशज), शूरः, कैटभमर्दनः (कैटभ दैत्य के नाशक)।
॥ ६५ ॥
सप्ततालप्रभेत्ता च मित्रवंशप्रवर्धनः ।
कालस्वरूपी कालात्मा कालः कल्याणदः कलिः ॥ ९२॥
अर्थ : सप्ततालप्रभेत्ता च (एक ही बाण से सात ताड़ के वृक्षों को भेदने वाले), मित्रवंशप्रवर्धनः (सूर्यवंश की शोभा बढ़ाने वाले), कालस्वरूपी कालात्मा कालः (महाकाल स्वरूप), कल्याणदः कलिः (कलिकल्मषहर्ता)।
॥ ६६ ॥
संवत्सरो ऋतुः पक्षो ह्ययनं दिवसो युगः ।
स्तव्यो विविक्तो निर्लेपः सर्वव्यापी निराकुलः ॥ ९३॥
अर्थ : संवत्सरो ऋतुः पक्षो ह्ययनं दिवसो युगः (काल की समस्त इकाइयों के स्वरूप), स्तव्यो (स्तुति योग्य), विविक्तो (एकान्तप्रिय), निर्लेपः (आसक्तिरहित), सर्वव्यापी, निराकुलः (व्याकुलतारहित शान्त)।
॥ ६७ ॥
अनादिनिधनः सर्वलोकपूज्यो निरामयः ।
रसो रसज्ञः सारज्ञो लोकसारो रसात्मकः ॥ ९४॥
अर्थ : अनादिनिधनः (जन्म-मरण से रहित), सर्वलोकपूज्यो, निरामयः (रोग-दोष रहित), रसो रसज्ञः सारज्ञो (परम रस के ज्ञाता), लोकसारो रसात्मकः (सम्पूर्ण जगत के सार एवं आनन्दस्वरूप)।
॥ ६८ ॥
सर्वदुःखातिगो विद्याराशिः परमगोचरः ।
शेषो विशेषो विगतकल्मषो रघुपुङ्गवः ॥ ९५॥
अर्थ : सर्वदुःखातिगो (समस्त दुःखों से परे), विद्याराशिः (समस्त विद्याओं के सागर), परमगोचरः (परम अनुभूति के विषय), शेषो विशेषो (अनन्तरूप एवं विशिष्ट), विगतकल्मषो (पापरहित), रघुपुङ्गवः।
॥ ६९ ॥
वर्णश्रेष्ठो वर्णभाव्यो वर्णो वर्णगुणोज्ज्वलः ।
कर्मसाक्षी गुणश्रेष्ठो देवः सुरवरप्रदः ॥ ९६॥
अर्थ : वर्णश्रेष्ठो वर्णभाव्यो (वर्णधर्म के नियामक), वर्णो वर्णगुणोज्ज्वलः, कर्मसाक्षी, गुणश्रेष्ठो, देवः, सुरवरप्रदः (देवताओं को वर देने वाले)।
॥ ७० ॥
देवाधिदेवो देवर्षिर्देवासुरनमस्कृतः ।
सर्वदेवमयश्चक्री शार्ङ्गपाणी रघूत्तमः ॥ ९७॥
अर्थ : देवाधिदेवो, देवर्षिर्, देवासुरनमस्कृतः (देवता और असुर दोनों द्वारा नमस्कृत), सर्वदेवमयश्चक्री, शार्ङ्गपाणी (हाथ में शार्ङ्ग धनुष लिए), रघूत्तमः (रघुवंशियों में सर्वश्रेष्ठ)।
॥ ७१ ॥
मनोगुप्तिरहङ्कारः प्रकृतिः पुरुषोऽव्ययः ।
न्यायो न्यायी नयी श्रीमान् नयो नगधरो ध्रुवः ॥ ९८॥
अर्थ : मनोगुप्तिरहङ्कारः प्रकृतिः पुरुषोऽव्ययः (मन, अहंकार, प्रकृति और अव्यय पुरुष रूप), न्यायो न्यायी नयी श्रीमान् (न्यायस्वरूप एवं नीतिकुशल), नयो नगधरो ध्रुवः (गोवर्धनधारी एवं अचल)।
॥ ७२ ॥
लक्ष्मीविश्वम्भरो भर्ता देवेन्द्रो बलिमर्दनः ।
बाणारिमर्दनो यज्वानुत्तमो मुनिसेवितः ॥ ९९॥
अर्थ : लक्ष्मीविश्वम्भरो भर्ता (लक्ष्मीपति एवं विश्वम्भर पोषक), देवेन्द्रो बलिमर्दनः (बलि का मानमर्दन करने वाले), बाणारिमर्दनो (बाणासुर के नाशक), यज्वानुत्तमो (श्रेष्ठ यज्ञकर्ता), मुनिसेवितः (मुनियों द्वारा सेवित)।
॥ ७३ ॥
देवाग्रणीः शिवध्यानतत्परः परमः परः ।
सामगेयः प्रियः शूरः पूर्णकीर्तिः सुलोचनः ॥ १००॥
अर्थ : देवाग्रणीः, शिवध्यानतत्परः (भगवान शिव के ध्यान में निमग्न), परमः परः (परात्पर), सामगेयः (सामवेद के मन्त्रों द्वारा गान किए जाने वाले), प्रियः, शूरः, पूर्णकीर्तिः, सुलोचनः (सुन्दर नेत्रों वाले)।
॥ ७४ ॥
अव्यक्तलक्षणो व्यक्तो दशास्यद्विपकेसरी ।
कलानिधिः कलानाथः कमलानन्दवर्धनः ॥ १०१॥
अर्थ : अव्यक्तलक्षणो व्यक्तो (अव्यक्त और व्यक्त रूप), दशास्यद्विपकेसरी (रावण रूपी हाथी के लिए सिंह सदृश), कलानिधिः कलानाथः (समस्त कलाओं के स्वामी चन्द्रमारूप), कमलानन्दवर्धनः (महालक्ष्मी को आनन्दित करने वाले)।
॥ ७५ ॥
पुण्यः पुण्याधिकः पूर्णः पूर्वः पूरयिता रविः ।
जटिलः कल्मषध्वान्तप्रभञ्जनविभावसुः ॥ १०२॥
अर्थ : पुण्यः, पुण्याधिकः, पूर्णः, पूर्वः, पूरयिता (मनोरथ पूर्ण करने वाले), रविः (सूर्य), जटिलः (तपस्वी वेश में जटाधारी), कल्मषध्वान्तप्रभञ्जनविभावसुः (पापरूपी अन्धकार का नाश करने वाले सूर्य)।
॥ ७६ ॥
जयी जितारिः सर्वादिः शमनो भवभञ्जनः ।
अलङ्करिष्णुरचलो रोचिष्णुर्विक्रमोत्तमः ॥ १०३॥
अर्थ : जयी, जितारिः, सर्वादिः, शमनो (पापशामक), भवभञ्जनः (संसार-बन्धन काटने वाले), अलङ्करिष्णुरचलो (शोभायमान एवं अचल), रोचिष्णुर्विक्रमोत्तमः (प्रकाशवान् एवं पराक्रमियों में श्रेष्ठ)।
॥ ७७ ॥
आशुः शब्दपतिः शब्दगोचरो रञ्जनो लघुः ।
निःशब्दपुरुषो मायो स्थूलः सूक्ष्मो विलक्षणः ॥ १०४॥
अर्थ : आशुः (शीघ्र फलदाता), शब्दपतिः (वाणी के स्वामी), शब्दगोचरो, रञ्जनो लघुः, निःशब्दपुरुषो, मायो स्थूलः सूक्ष्मो विलक्षणः (स्थूल, सूक्ष्म एवं विलक्षण स्वरूप वाले)।
॥ ७८ ॥
आत्मयोनिरयोनिश्च सप्तजिह्वः सहस्रपात् ।
सनातनतमः स्रग्वी पेशलो विजितांबरः ॥ १०५॥
अर्थ : आत्मयोनिरयोनिश्च (स्वयंभू एवं अजन्मा), सप्तजिह्वः (अग्निरूप), सहस्रपात्, सनातनतमः, स्रग्वी (वनमालाधारी), पेशलो (सुकुमार), विजितांबरः (दिगम्बर एवं अम्बर विजयी)।
॥ ७९ ॥
शक्तिमान् शङ्खभृन्नाथो गदाधररथाङ्गभृत् ।
निरीहो निर्विकल्पश्च चिद्रूपो वीतसाध्वसः ॥ १०६॥
अर्थ : शक्तिमान्, शङ्खभृन्नाथो (शङ्खधारी प्रभु), गदाधररथाङ्गभृत् (गदा और चक्रधारी), निरीहो (इच्छारहित), निर्विकल्पश्च, चिद्रूपो (ज्ञानस्वरूप), वीतसाध्वसः (भयरहित)।
॥ ८० ॥
सनातनः सहस्राक्षः शतमूर्तिर्घनप्रभः ।
हृत्पुण्डरीकशयनः कठिनो द्रव एव च ॥ १०७॥
अर्थ : सनातनः, सहस्राक्षः (हजारों नेत्रों वाले), शतमूर्तिर्घनप्रभः (सैकड़ों रूपों वाले एवं मेघतुल्य आभा वाले), हृत्पुण्डरीकशयनः (हृदयकमल में शयन करने वाले), कठिनो द्रव एव च (कठोर और द्रवित दोनों रूपों वाले)।
॥ ८१ ॥
सूर्यो ग्रहपतिः श्रीमान् समर्थोऽनर्थनाशनः ।
अधर्मशत्रू रक्षोघ्नः पुरुहूतः पुरस्तुतः ॥ १०८॥
अर्थ : सूर्यो, ग्रहपतिः, श्रीमान्, समर्थोऽनर्थनाशनः (समस्त अनर्थों के नाशक), अधर्मशत्रू, रक्षोघ्नः (राक्षसों के नाशक), पुरुहूतः पुरस्तुतः (इन्द्र आदि द्वारा संस्तुत)।
॥ ८२ ॥
ब्रह्मगर्भो बृहद्गर्भो धर्मधेनुर्धनागमः ।
हिरण्यगर्भो ज्योतिष्मान् सुललाटः सुविक्रमः ॥ १०९॥
अर्थ : ब्रह्मगर्भो बृहद्गर्भो, धर्मधेनुर्धनागमः (धर्मरूपी कामधेनु एवं वास्तविक सम्पत्ति), हिरण्यगर्भो, ज्योतिष्मान्, सुललाटः (सुन्दर ललाट वाले), सुविक्रमः।
॥ ८३ ॥
शिवपूजारतः श्रीमान् भवानीप्रियकृद्वशी ।
नरो नारायणः श्यामः कपर्दी नीललोहितः ॥ ११०॥
अर्थ : शिवपूजारतः (भगवान शिव की पूजा में संलग्न), श्रीमान्, भवानीप्रियकृद्वशी (पार्वती जी का प्रिय करने वाले एवं जितेन्द्रिय), नरो नारायणः श्यामः, कपर्दी नीललोहितः (शिवस्वरूप नीललोहित)।
॥ ८४ ॥
रुद्रः पशुपतिः स्थाणुर्विश्वामित्रो द्विजेश्वरः ।
मातामहो मातरिश्वा विरिञ्चिर्विष्टरश्रवाः ॥ १११॥
अर्थ : रुद्रः, पशुपतिः, स्थाणुर्, विश्वामित्रो, द्विजेश्वरः (ब्राह्मणों के स्वामी), मातामहो मातरिश्वा (वायु), विरिञ्चिर् (ब्रह्मा), विष्टरश्रवाः (विष्णु)।
॥ ८५ ॥
अक्षोभ्यः सर्वभूतानां चण्डः सत्यपराक्रमः ।
वालखिल्यो महाकल्पः कल्पवृक्षः कलाधरः ॥ ११२॥
अर्थ : अक्षोभ्यः सर्वभूतानां (कभी क्षुब्ध न होने वाले), चण्डः (शत्रुओं के लिए उग्र), सत्यपराक्रमः, वालखिल्यो, महाकल्पः, कल्पवृक्षः (मनोकामना पूर्ण करने वाले कल्पवृक्ष), कलाधरः (चन्द्रमा)।
॥ ८६ ॥
निदाघस्तपनो मेघः शुक्रः परबलापहृत् ।
वसुश्रवाः कव्यवाहः प्रतप्तो विश्वभोजनः ॥ ११३॥
अर्थ : निदाघस्तपनो मेघः (ग्रीष्म, सूर्य और वर्षा के मेघ), शुक्रः, परबलापहृत् (शत्रुबल का हरण करने वाले), वसुश्रवाः, कव्यवाहः (अग्नि), प्रतप्तो, विश्वभोजनः (संसार को तृप्त करने वाले)।
॥ ८७ ॥
रामो नीलोत्पलश्यामो ज्ञानस्कन्दो महाद्युतिः ।
कबन्धमथनो दिव्यः कम्बुग्रीवः शिवप्रियः ॥ ११४॥
अर्थ : रामो नीलोत्पलश्यामो, ज्ञानस्कन्दो (ज्ञान के आधार), महाद्युतिः, कबन्धमथनो (कबन्ध का उद्धार करने वाले), दिव्यः, कम्बुग्रीवः (शङ्ख के समान सुन्दर कण्ठ वाले), शिवप्रियः (भगवान शिव के अतिप्रिय)।
॥ ८८ ॥
सुखी नीलः सुनिष्पन्नः सुलभः शिशिरात्मकः ।
असंसृष्टोऽतिथिः शूरः प्रमाथी पापनाशकृत् ॥ ११५॥
अर्थ : सुखी, नीलः, सुनिष्पन्नः, सुलभः, शिशिरात्मकः (शीतलता प्रदान करने वाले), असंसृष्टोऽतिथिः, शूरः, प्रमाथी (दुष्टमर्दन), पापनाशकृत्।
॥ ८९ ॥
पवित्रपादः पापारिर्मणिपूरो नभोगतिः ।
उत्तारणो दुष्कृतिहा दुर्धर्षो दुःसहो बलः ॥ ११६॥
अर्थ : पवित्रपादः (पवित्र चरणों वाले गंगाजनक), पापारिर् (पापों के शत्रु), मणिपूरो, नभोगतिः, उत्तारणो (भवसागर से पार लगाने वाले), दुष्कृतिहा (दुराचारियों के नाशक), दुर्धर्षो दुःसहो बलः (असह्य बल वाले)।
॥ ९० ॥
अमृतेशोऽमृतवपुर्धर्मी धर्मः कृपाकरः ।
भगो विवस्वानादित्यो योगाचार्यो दिवस्पतिः ॥ ११७॥
अर्थ : अमृतेशोऽमृतवपुर् (अमृतमय स्वरूप), धर्मी, धर्मः, कृपाकरः, भगो विवस्वानादित्यो, योगाचार्यो, दिवस्पतिः (स्वर्ग के स्वामी)।
॥ ९१ ॥
उदारकीर्तिरुद्योगी वाङ्मयः सदसन्मयः ।
नक्षत्रमानी नाकेशः स्वाधिष्ठानः षडाश्रयः ॥ ११८॥
अर्थ : उदारकीर्तिरुद्योगी, वाङ्मयः (समस्त साहित्यरूप), सदसन्मयः (सत् और असत् दोनों में व्याप्त), नक्षत्रमानी नाकेशः, स्वाधिष्ठानः षडाश्रयः।
॥ ९२ ॥
चतुर्वर्गफलं वर्णशक्तित्रयफलं निधिः ।
निधानगर्भो निर्व्याजो निरीशो व्यालमर्दनः ॥ ११९॥
अर्थ : चतुर्वर्गफलं (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी फल देने वाले), वर्णशक्तित्रयफलं, निधिः, निधानगर्भो निर्व्याजो (कपटहीन), निरीशो व्यालमर्दनः (कालियनाग मर्दन करने वाले)।
॥ ९३ ॥
श्रीवल्लभः शिवारंभः शान्तो भद्रः समञ्जयः ।
भूशायी भूतकृद्भूतिर्भूषणो भूतभावनः ॥ १२०॥
अर्थ : श्रीवल्लभः, शिवारंभः (कल्याण के आदि), शान्तो, भद्रः, समञ्जयः, भूशायी (दर्भासन पर शयन करने वाले), भूतकृद्भूतिर् (ऐश्वर्यरूप), भूषणो भूतभावनः।
॥ ९४ ॥
अकायो भक्तकायस्थः कालज्ञानी महापटुः ।
परार्धवृत्तिरचलो विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ १२१॥
अर्थ : अकायो (शरीर के बन्धनों से मुक्त), भक्तकायस्थः (भक्तों के हृदय में वास करने वाले), कालज्ञानी, महापटुः, परार्धवृत्तिरचलो, विविक्तः, श्रुतिसागरः (वेदों के अगाध समुद्र)।
॥ ९५ ॥
स्वभावभद्रो मध्यस्थः संसारभयनाशनः ।
वेद्यो वैद्यो वियद्गोप्ता सर्वामरमुनीश्वरः ॥ १२२॥
अर्थ : स्वभावभद्रो मध्यस्थः, संसारभयनाशनः (संसार के समस्त भयों के नाशक), वेद्यो वैद्यो (भव-रोग के परम चिकित्सक), वियद्गोप्ता, सर्वामरमुनीश्वरः (समस्त देवताओं और मुनियों के ईश्वर)।
॥ ९६ ॥
सुरेन्द्रः कारणं कर्मकरः कर्मी ह्यधोक्षजः ।
धैर्योऽग्रधुर्यो धात्रीशः सङ्कल्पः शर्वरीपतिः ॥ १२३॥
अर्थ : सुरेन्द्रः, कारणं कर्मकरः कर्मी ह्यधोक्षजः (इन्द्रियों से परे), धैर्योऽग्रधुर्यो धात्रीशः (पृथ्वीपति), सङ्कल्पः, शर्वरीपतिः (रात्रि के स्वामी चन्द्रमा)।
॥ ९७ ॥
परमार्थगुरुर्दृष्टिः सुचिराश्रितवत्सलः ।
विष्णुर्जिष्णुर्विभुर्यज्ञो यज्ञेशो यज्ञपालकः ॥ १२४॥
अर्थ : परमार्थगुरुर्दृष्टिः, सुचिराश्रितवत्सलः (सदा शरणागतों पर स्नेह रखने वाले), विष्णुर्जिष्णुर्विभुर्यज्ञो, यज्ञेशो यज्ञपालकः (यज्ञ के रक्षक)।
॥ ९८ ॥
प्रभुर्विष्णुर्ग्रसिष्णुश्च लोकात्मा लोकपालकः ।
केशवः केशिहा काव्यः कविः कारणकारणम् ॥ १२५॥
अर्थ : प्रभुर्विष्णुर्ग्रसिष्णुश्च (प्रलय में सबको समाहित करने वाले), लोकात्मा, लोकपालकः, केशवः, केशिहा (केशी दैत्य के नाशक), काव्यः, कविः, कारणकारणम् (कारणों के भी आदि कारण)।
॥ ९९ ॥
कालकर्ता कालशेषो वासुदेवः पुरुष्टुतः ।
आदिकर्ता वराहश्च वामनो मधुसूदनः ॥ १२६॥
अर्थ : कालकर्ता, कालशेषो, वासुदेवः, पुरुष्टुतः, आदिकर्ता, वराहश्च (वराहावतार), वामनो, मधुसूदनः (मधु दैत्य के संहारक)।
॥ १०० ॥
नारायणो नरो हंसो विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
विश्वकर्ता महायज्ञो ज्योतिष्मान्पुरुषोत्तमः ॥ १२७॥
अर्थ : नारायणो, नरो, हंसो, विष्वक्सेनो, जनार्दनः, विश्वकर्ता, महायज्ञो, ज्योतिष्मान्पुरुषोत्तमः।
॥ १०१ ॥
वैकुण्ठः पुण्डरीकाक्षः कृष्णः सूर्यः सुरार्चितः ।
नारसिंहो महाभीमो वज्रदंष्ट्रो नखायुधः ॥ १२८॥
अर्थ : वैकुण्ठः, पुण्डरीकाक्षः, कृष्णः, सूर्यः, सुरार्चितः, नारसिंहो (नृसिंहावतार), महाभीमो, वज्रदंष्ट्रो नखायुधः (वज्र के समान दाढ़ों और नखों वाले)।
॥ १०२ ॥
आदिदेवो जगत्कर्ता योगीशो गरुडध्वजः ।
गोविन्दो गोपतिर्गोप्ता भूपतिर्भुवनेश्वरः ॥ १२९॥
अर्थ : आदिदेवो, जगत्कर्ता, योगीशो (योगियों के ईश्वर), गरुडध्वजः, गोविन्दो, गोपतिर्गोप्ता, भूपतिर्भुवनेश्वरः (संसार के स्वामी)।
॥ १०३ ॥
पद्मनाभो हृषीकेशो धाता दामोदरः प्रभुः ।
त्रिविक्रमस्त्रिलोकेशो ब्रह्मेशः प्रीतिवर्धनः ॥ १३०॥
अर्थ : पद्मनाभो (नाभि में कमल धारण करने वाले), हृषीकेशो (इन्द्रियों के स्वामी), धाता, दामोदरः, प्रभुः, त्रिविक्रमस्, त्रिलोकेशो, ब्रह्मेशः, प्रीतिवर्धनः।
॥ १०४ ॥
संन्यासी शास्त्रतत्त्वज्ञो मन्दिरो गिरिशो नतः ।
वामनो दुष्टदमनो गोविन्दो गोपवल्लभः ॥ १३१॥
अर्थ : संन्यासी, शास्त्रतत्त्वज्ञो, मन्दिरो, गिरिशो नतः (शिव जी द्वारा नत), वामनो, दुष्टदमनो, गोविन्दो गोपवल्लभः (गोपियों के प्रियतम)।
॥ १०५ ॥
भक्तप्रियोऽच्युतः सत्यः सत्यकीर्तिर्धृतिः स्मृतिः ।
कारुण्यः करुणो व्यासः पापहा शान्तिवर्धनः ॥ १३२॥
अर्थ : भक्तप्रियोऽच्युतः, सत्यः, सत्यकीर्तिर्धृतिः स्मृतिः, कारुण्यः करुणो व्यासः, पापहा शान्तिवर्धनः (शान्ति को बढ़ाने वाले)।
॥ १०६ ॥
बदरीनिलयः शान्तस्तपस्वी वैद्युतः प्रभुः ।
भूतावासो महावासो श्रीनिवासः श्रियः पतिः ॥ १३३॥
अर्थ : बदरीनिलयः (बदरीनाथ धाम में वास करने वाले), शान्तस्तपस्वी, वैद्युतः प्रभुः, भूतावासो महावासो, श्रीनिवासः श्रियः पतिः (महालक्ष्मी के स्वामी)।
॥ १०७ ॥
तपोवासो मुदावासः सत्यवासः सनातनः ।
पुरुषः पुष्करः पुण्यः पुष्कराक्षो महेश्वरः ॥ १३४॥
अर्थ : तपोवासो मुदावासः (आनन्द के धाम), सत्यवासः सनातनः, पुरुषः, पुष्करः, पुण्यः, पुष्कराक्षो महेश्वरः।
॥ १०८ ॥
पूर्णमूर्तिः पुराणज्ञः पुण्यदः प्रीतिवर्धनः ।
पूर्णरूपः कालचक्रप्रवर्तनसमाहितः ॥ १३५॥
अर्थ : पूर्णमूर्तिः, पुराणज्ञः, पुण्यदः, प्रीतिवर्धनः, पूर्णरूपः, कालचक्रप्रवर्तनसमाहितः (कालचक्र को चलाने में स्थित)।
॥ १०९ ॥
नारायणः परञ्ज्योतिः परमात्मा सदाशिवः ।
शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी लाङ्गली मुसली हली ॥ १३६॥
अर्थ : नारायणः परञ्ज्योतिः, परमात्मा सदाशिवः, शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी लाङ्गली मुसली हली (शङ्ख, चक्र, गदा, धनुष, हल और मूसल धारण करने वाले)।
॥ ११० ॥
किरीटी कुण्डली हारी मेखली कवची ध्वजी ।
योद्धा जेता महावीर्यः शत्रुघ्नः शत्रुतापनः ॥ १३७॥
अर्थ : किरीटी कुण्डली हारी मेखली कवची ध्वजी (मुकुट, कुण्डल, हार, करधनी, कवच और ध्वजा धारण करने वाले), योद्धा जेता महावीर्यः, शत्रुघ्नः शत्रुतापनः।
॥ १११ ॥
शास्ता शास्त्रकरः शास्त्रं शङ्करः शङ्करस्तुतः ।
सारथी सात्त्विकः स्वामी सामवेदप्रियः समः ॥ १३८॥
अर्थ : शास्ता, शास्त्रकरः, शास्त्रं, शङ्करः शङ्करस्तुतः (भगवान शंकर द्वारा स्तुत), सारथी, सात्त्विकः, स्वामी, सामवेदप्रियः समः (सामगान-प्रिय एवं समदर्शी)।
॥ ११२ ॥
पवनः संहितः शक्तिः सम्पूर्णाङ्गः समृद्धिमान् ।
स्वर्गदः कामदः श्रीदः कीर्तिदः कीर्तिदायकः ॥ १३९॥
अर्थ : पवनः, संहितः, शक्तिः, सम्पूर्णाङ्गः समृद्धिमान्, स्वर्गदः, कामदः, श्रीदः, कीर्तिदः कीर्तिदायकः (यश और ऐश्वर्य देने वाले)।
॥ ११३ ॥
मोक्षदः पुण्डरीकाक्षः क्षीराब्धिकृतकेतनः ।
सर्वात्मा सर्वलोकेशः प्रेरकः पापनाशनः ॥ १४०॥
अर्थ : मोक्षदः (मोक्षदाता), पुण्डरीकाक्षः, क्षीराब्धिकृतकेतनः (क्षीरसागर में शयन करने वाले), सर्वात्मा, सर्वलोकेशः, प्रेरकः पापनाशनः।
॥ ११४ ॥
वैकुण्ठः पुण्डरीकाक्षः सर्वदेवनमस्कृतः ।
सर्वव्यापी जगन्नाथः सर्वलोकमहेश्वरः ॥ १४१॥
अर्थ : वैकुण्ठः, पुण्डरीकाक्षः, सर्वदेवनमस्कृतः, सर्वव्यापी, जगन्नाथः, सर्वलोकमहेश्वरः।
॥ ११५ ॥
सर्गस्थित्यन्तकृद्देवः सर्वलोकसुखावहः ।
अक्षयः शाश्वतोऽनन्तः क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥ १४२॥
अर्थ : सर्गस्थित्यन्तकृद्देवः (सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने वाले परम देव), सर्वलोकसुखावहः, अक्षयः, शाश्वतोऽनन्तः (अनन्तरूप), क्षयवृद्धिविवर्जितः (घटने-बढ़ने से रहित)।
॥ ११६ ॥
निर्लेपो निर्गुणः सूक्ष्मो निर्विकारो निरञ्जनः ।
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तः सत्तामात्रव्यवस्थितः ॥ १४३॥
अर्थ : निर्लेपो, निर्गुणः, सूक्ष्मो, निर्विकारो, निरञ्जनः, सर्वोपाधिविनिर्मुक्तः, सत्तामात्रव्यवस्थितः (विशुद्ध चैतन्य सत्ता में स्थित)।
॥ ११७ ॥
अधिकारी विभुर्नित्यः परमात्मा सनातनः ।
अचलो निश्चलो व्यापी नित्यतृप्तो निराश्रयः ॥ १४४॥
अर्थ : अधिकारी, विभुर्नित्यः, परमात्मा सनातनः, अचलो, निश्चलो, व्यापी, नित्यतृप्तो, निराश्रयः (स्वयं सबके आश्रय, किसी अन्य के आश्रित नहीं)।
॥ ११८ ॥
श्यामी युवा लोहिताक्षो दीप्त्या शोभितभाषणः ।
आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥ १४५॥
अर्थ : श्यामी युवा (सदा नित्यकिशोर श्यामसुन्दर), लोहिताक्षो (रक्तिम कमल नयन), दीप्त्या शोभितभाषणः, आजानुबाहुः सुमुखः, सिंहस्कन्धो महाभुजः (सिंह के समान कंधों और विशाल भुजाओं वाले)।
॥ ११९ ॥
सत्त्ववान् गुणसम्पन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा ।
कालात्मा भगवान् कालः कालचक्रप्रवर्तकः ॥ १४६॥
अर्थ : सत्त्ववान्, गुणसम्पन्नो, दीप्यमानः स्वतेजसा (अपने ही तेज से देदीप्यमान), कालात्मा भगवान् कालः, कालचक्रप्रवर्तकः।
॥ १२० ॥
नारायणः परञ्ज्योतिः परमात्मा सनातनः ।
विश्वकृद्विश्वभोक्ता च विश्वगोप्ता च शाश्वतः ॥ १४७॥
अर्थ : नारायणः परञ्ज्योतिः, परमात्मा सनातनः, विश्वकृद्विश्वभोक्ता च, विश्वगोप्ता च शाश्वतः (संसार के स्रष्टा, भोक्ता और नित्य रक्षक)।
॥ १२१ ॥
विश्वेश्वरो विश्वमूर्तिर्विश्वात्मा विश्वभावनः ।
सर्वभूतसुहृच्छान्तः सर्वभूतानुकम्पनः ॥ १४८॥
अर्थ : विश्वेश्वरो, विश्वमूर्तिर्, विश्वात्मा, विश्वभावनः, सर्वभूतसुहृच्छान्तः (समस्त जीवों के परम हितैषी व परम शान्त), सर्वभूतानुकम्पनः (सब पर दया करने वाले)।
॥ १२२ ॥
सर्वेश्वरः सर्वशर्वः सर्वदाऽऽश्रितवत्सलः ।
सर्वगः सर्वभूतेशः सर्वभूताशयस्थितः ॥ १४९॥
अर्थ : सर्वेश्वरः, सर्वशर्वः, सर्वदाऽऽश्रितवत्सलः (सदा शरणागतों पर वात्सल्य रखने वाले), सर्वगः, सर्वभूतेशः, सर्वभूताशयस्थितः (समस्त प्राणियों के हृदय में विराजमान)।
॥ १२३ ॥
अभ्यन्तरस्थस्तमसश्छेत्ता नारायणः परः ।
अनादिनिधनः स्रष्टा प्रजापतिपतिर्हरिः ॥ १५०॥
अर्थ : अभ्यन्तरस्थस् (अन्तरात्मा में स्थित), तमसश्छेत्ता (अज्ञानान्धकार के नाशक), नारायणः परः, अनादिनिधनः, स्रष्टा, प्रजापतिपतिर्हरिः।
॥ १२४ ॥
नरसिंहो हृषीकेशः सर्वात्मा सर्वदृग्वशी ।
जगतस्तस्थुषश्चैव प्रभुर्नेता सनातनः ॥ १५१॥
अर्थ : नरसिंहो, हृषीकेशः, सर्वात्मा, सर्वदृग्वशी (सबको देखने वाले एवं सर्ववशकारी), जगतस्तस्थुषश्चैव प्रभुर्नेता सनातनः (सम्पूर्ण चराचर जगत के स्वामी और संचालक)।
॥ १२५ ॥
कर्ता धाता विधाता च सर्वेषां पतिरीश्वरः ।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा विष्णुर्विश्वदृगव्ययः ॥ १५२॥
अर्थ : कर्ता धाता विधाता च, सर्वेषां पतिरीश्वरः, सहस्रमूर्धा विश्वात्मा, विष्णुर्विश्वदृगव्ययः (सहस्रों शीश वाले विराट् विश्वात्मा विष्णु)।
॥ १२६ ॥
पुराणपुरुषः श्रेष्ठः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
तत्त्वं नारायणो विष्णुर्वासुदेवः सनातनः ॥ १५३॥
अर्थ : पुराणपुरुषः श्रेष्ठः, सहस्राक्षः सहस्रपात्, तत्त्वं नारायणो विष्णुर्, वासुदेवः सनातनः।
॥ १२७ ॥
परमात्मा परंब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रहः ।
परञ्ज्योतिः परन्धाम पराकाशः परात्परः ॥ १५४॥
अर्थ : परमात्मा, परंब्रह्म, सच्चिदानन्दविग्रहः, परञ्ज्योतिः, परन्धाम (परम धाम), पराकाशः, परात्परः।
॥ १२८ ॥
अच्युतः पुरुषः कृष्णः शाश्वतः शिव ईश्वरः ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणू रुद्रः साक्षी प्रजापतिः ॥ १५५॥
अर्थ : अच्युतः, पुरुषः, कृष्णः, शाश्वतः, शिव ईश्वरः, नित्यः, सर्वगतः, स्थाणू, रुद्रः, साक्षी, प्रजापतिः।
॥ १२९ ॥
हिरण्यगर्भः सविता लोककृल्लोकभुग्विभुः ।
ओङ्कारवाच्यो भगवान् श्रीभूलीलापतिः प्रभुः ॥ १५६॥
अर्थ : हिरण्यगर्भः, सविता (सूर्य), लोककृल्लोकभुग्विभुः, ओङ्कारवाच्यो (प्रणव ओंकार द्वारा प्रतिपाद्य), भगवान्, श्रीभूलीलापतिः प्रभुः (श्री, भू और लीला शक्तियों के स्वामी)।
॥ १३० ॥
सर्वलोकेश्वरः श्रीमान् सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।
स्वामी सुशीलः सुलभः सर्वगः सर्वशक्तिमान् ॥ १५७॥
अर्थ : सर्वलोकेश्वरः, श्रीमान्, सर्वज्ञः, सर्वतोमुखः (सब ओर मुख वाले), स्वामी, सुशीलः, सुलभः (भक्तों के लिए अति सुलभ), सर्वगः, सर्वशक्तिमान्।
॥ १३१ ॥
नित्यः सम्पूर्णकामश्च नैसर्गिकसुहृत्सुखी ।
कृपापीयूषजलधिः शरण्यः सर्वशक्तिमान् ॥ १५८॥
अर्थ : नित्यः, सम्पूर्णकामश्च (आप्तकाम), नैसर्गिकसुहृत्सुखी (जीवों के स्वाभाविक मित्र), कृपापीयूषजलधिः (कृपा रूपी अमृत के महासागर), शरण्यः, सर्वशक्तिमान्।
॥ १३२ ॥
श्रीमान्नारायणः स्वामी जगतां प्रभुरीश्वरः ।
मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहोऽथ वामनः ॥ १५९॥
अर्थ : श्रीमान्नारायणः स्वामी जगतां प्रभुरीश्वरः, मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहोऽथ वामनः (दशावतार रूप)।
॥ १३३ ॥
रामो रामश्च कृष्णश्च बौद्धः कल्की परात्परः ।
अयोध्येशो नृपश्रेष्ठः कुशबालः परन्तपः ॥ १६०॥
अर्थ : रामो (परशुराम), रामश्च (श्रीराम), कृष्णश्च, बौद्धः, कल्की परात्परः, अयोध्येशो (अयोध्या के राजा), नृपश्रेष्ठः, कुशबालः (कुश के पिता), परन्तपः (शत्रुतापक)।
॥ १३४ ॥
लवबालः कञ्जनेत्रः कञ्जाङ्घ्रिः पङ्कजाननः ।
सीताकान्तः सौम्यरूपः शिशुजीवनतत्परः ॥ १६१॥
अर्थ : लवबालः (लव के पिता), कञ्जनेत्रः (कमलनयन), कञ्जाङ्घ्रिः (चरणकमल वाले), पङ्कजाननः (कमलमुख), सीताकान्तः, सौम्यरूपः, शिशुजीवनतत्परः (बालकों के जीवनदाता)।
॥ १३५ ॥
सेतुकृच्चित्रकूटस्थः शबरीसंस्तुतः प्रभुः ।
योगिध्येयः शिवध्येयः शास्ता रावणदर्पहा ॥ १६२॥
अर्थ : सेतुकृच्चित्रकूटस्थः (समुद्र पर सेतु बांधने वाले एवं पावन चित्रकूट धाम में वास करने वाले), शबरीसंस्तुतः प्रभुः (भक्त शबरी द्वारा पूजित प्रभु), योगिध्येयः, शिवध्येयः (भगवान शिव द्वारा नित्य ध्याये जाने वाले), शास्ता, रावणदर्पहा (रावण का घमण्ड चूर करने वाले)।
॥ १३६ ॥
श्रीशः शरण्यो भूतानां संश्रिताभीष्टदायकः ।
अनन्तः श्रीपती रामो गुणभृन्निर्गुणो महान् ॥ १६३॥
अर्थ : श्रीशः, शरण्यो भूतानां, संश्रिताभीष्टदायकः (शरणागतों की अभीष्ट मनोकामना पूर्ण करने वाले), अनन्तः, श्रीपती, रामो, गुणभृन्निर्गुणो महान् (सगुण और निर्गुण दोनों रूपों में परम महान्)।
॥ फलश्रुतिः ॥
॥ १३७ ॥
एवमादीनि नामानि ह्यसङ्ख्यान्यपराणि च ।
एकैकं नाम रामस्य सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १६४॥
अर्थ : भगवान शिव कहते हैं — इस प्रकार भगवान श्रीराम के ये सहस्र नाम तथा अन्य असङ्ख्य नाम भी हैं। श्रीराम का एक-एक नाम ही सम्पूर्ण पापों का समूल नाश करने वाला है।
॥ १३८ ॥
सहस्रनामफलदं सर्वैश्वर्यप्रदायकम् ।
सर्वसिद्धिकरं पुण्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ १६५॥
अर्थ : यह सहस्रनाम सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करने वाला, समस्त सिद्धियों को देने वाला, परम पवित्र तथा इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति (मोक्ष) प्रदान करने वाला है।
॥ १३९ ॥
मन्त्रात्मकमिदं सर्वं व्याख्यातं सर्वमङ्गलम् ।
उक्तानि तव पुत्रेण विघ्नराजेन धीमता ॥ १६६॥
अर्थ : यह सम्पूर्ण स्तोत्र मन्त्रमय, सर्वकल्याणकारी तथा परम मंगलमय है। पूर्वकाल में इसे तुम्हारे बुद्धिमान पुत्र विघ्नराज (श्री गणेश) ने कहा था।
॥ १४० ॥
सनत्कुमाराय पुरा तान्युक्तानि मया तव ।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि स तु ब्रह्मपदं लभेत् ॥ १६७॥
अर्थ : तथा पूर्वकाल में मैंने भी इसे सनत्कुमार जी को उपदेशित किया था, वही मैंने तुम्हें सुनाया है। जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करता है अथवा श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, वह परम ब्रह्मपद को प्राप्त होता है।
॥ १४१ ॥
तावदेव बलं तेषां महापातकदन्तिनाम् ।
यावन्न श्रूयते रामनामपञ्चाननध्वनिः ॥ १६८॥
अर्थ : महापातकरूपी हाथियों का बल तभी तक रहता है, जब तक कि श्रीरामनाम रूपी सिंह (पञ्चानन) की गर्जना का गम्भीर स्वर सुनाई नहीं देता। (अर्थात् नाम-स्मरण होते ही समस्त महापाप नष्ट हो जाते हैं।)
॥ १४२ ॥
ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः ।
शरणागतघाती च मित्रविश्वासघातकः ॥ १६९॥
अर्थ : ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, सुवर्ण-चोर, गुरुपत्नीगामी, शरणागत का हनन करने वाला तथा मित्र से विश्वासघात करने वाला —
॥ १४३ ॥
मातृहा पितृहा चैव भ्रूणहा वीरहा तथा ।
कोटिकोटिसहस्राणि ह्युपपापानि यान्यपि ॥ १७०॥
अर्थ : माता-पिता का वध करने वाला, भ्रूण-हत्यारा, वीर-घातक तथा करोड़ों-करोड़ जो भी घोर उपपाप हैं —
॥ १४४ ॥
संवत्सरं क्रमाज्जप्त्वा प्रत्यहं रामसन्निधौ ।
निष्कण्टकं सुखं भुक्त्वा ततो मोक्षमवाप्नुयात् ॥ १७१॥
अर्थ : वह मनुष्य प्रतिदिन भगवान श्रीराम के विग्रह के सम्मुख बैठकर एक वर्ष तक क्रमशः इस स्तोत्र का जप करे, तो वह इस लोक में निष्कण्टक परम सुख भोगकर अन्त में परम मोक्ष को प्राप्त होता है।
॥ १४५ ॥
श्रीरामनाम्नां परमं सहस्रकं पापापहं सौख्यविवृद्धिकारकम् ।
भवापहं भक्तजनैकपालकं स्त्रीपुत्रपौत्रप्रदमृद्धिदायकम् ॥
अर्थ : भगवान श्रीराम के नामों का यह परम पावन सहस्रनाम स्तोत्र समस्त पापों का हरण करने वाला, सुख-सौभाग्य की वृद्धि करने वाला, संसार-भय का नाश करने वाला, भक्तजनों का एकमात्र रक्षक, तथा स्त्री, पुत्र, पौत्र, धन-धान्य और समस्त ऋद्धि-सिद्धियों को देने वाला है।
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
राज्यकाण्डे पूर्वार्धे श्रीरामसहस्रनामकथनं नाम प्रथमः सर्गः ॥