॥ श्रीहरिः ॥
श्रीरामाष्टकम्

श्रीरामाष्टकम्

महर्षि वेदव्यास

🌸 स्तोत्र

महर्षि वेदव्यास द्वारा विरचित 'श्रीरामाष्टकम्' भगवान श्रीराम के सगुण-साकार सौन्दर्य एवं निर्गुण-निराकार परब्रह्म स्वरूप का अद्भुत एवं वेदान्तसम्मत संगम है। आठ पावन श्लोकों में प्रभु को समस्त पापों का नाश करने वाला, अज्ञान-भय का भञ्जन करने वाला, भवसागर से तारने वाली नौका तथा चिदेकरूप अद्वैत परब्रह्म बताया गया है। नवम श्लोक इसकी फलश्रुति है, जिसके अनुसार इसके नित्य पाठ एवं श्रवण से विद्या, श्री (लक्ष्मी), विपुल सुख, अनन्त कीर्ति और अन्ततः परम मोक्ष की प्राप्ति होती है। पौराणिक परम्परा में आनन्दरामायणान्तर्गत भगवान शिव द्वारा उच्चरित 'श्रीरामचन्द्राष्टकम्' (सुग्रीवमित्रं परमं पवित्रं...) भी सुप्रसिद्ध है।

श्रीरामाष्टकम्

महर्षि वेदव्यास द्वारा विरचित 'श्रीरामाष्टकम्' भगवान श्रीराम के सगुण-साकार सौन्दर्य एवं निर्गुण-निराकार परब्रह्म स्वरूप का अद्भुत एवं वेदान्तसम्मत संगम है। आठ पावन श्लोकों में प्रभु को समस्त पापों का नाश करने वाला, अज्ञान-भय का भञ्जन करने वाला, भवसागर से तारने वाली नौका तथा चिदेकरूप अद्वैत परब्रह्म बताया गया है। नवम श्लोक इसकी फलश्रुति है, जिसके अनुसार इसके नित्य पाठ एवं श्रवण से विद्या, श्री (लक्ष्मी), विपुल सुख, अनन्त कीर्ति और अन्ततः परम मोक्ष की प्राप्ति होती है। पौराणिक परम्परा में आनन्दरामायणान्तर्गत भगवान शिव द्वारा उच्चरित 'श्रीरामचन्द्राष्टकम्' (सुग्रीवमित्रं परमं पवित्रं...) भी सुप्रसिद्ध है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ अथ महर्षिवेदव्यासविरचितं श्रीरामाष्टकम् ॥
ॐ अस्य श्रीरामाष्टकस्तोत्रस्य महर्षि वेदव्यास ऋषिः, श्रीसीतारामचन्द्रो देवता, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीसीतारामचन्द्र-प्रीत्यर्थे जपे पाठे च विनियोगः।
॥ १ ॥
भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव राममद्वयम्॥ १ ॥
अर्थ : जो अनुपम और विशेष रूप से परम सुन्दर हैं, भक्तों के समस्त पापों का समूल नाश (खण्डन) करने वाले हैं तथा अपने भक्तों के चित्त को नित्य आनन्दित करने वाले हैं — उन अद्वितीय (अद्वैत ब्रह्म स्वरूप) भगवान् श्री राम का मैं सदैव भजन करता हूँ।
॥ २ ॥
जटाकलापशोभितं समस्तपापनाशकम्।
स्वभक्तभीतिभञ्जनं भजे ह राममद्वयम्॥ २ ॥
अर्थ : जिनके मस्तक पर मनोहर जटाओं का समूह सुशोभित है, जो समस्त पाप-तापों का संहार करने वाले हैं और अपने भक्तों के सभी भयों का भञ्जन (निवारण) करने वाले हैं — उन अद्वितीय प्रभु श्री राम का मैं भजन करता हूँ।
॥ ३ ॥
निजस्वरूपबोधकं कृपाकरं भवापहम्।
समं शिवं निरञ्जनं भजे ह राममद्वयम्॥ ३ ॥
अर्थ : जो आत्म-स्वरूप (परम सत्य) का साक्षात्कार कराने वाले हैं, करुणा के सागर हैं, संसार-सागर के जन्म-मरण रूपी कष्टों को हरने वाले हैं, समदर्शी, परमकल्याणमय (शिव) और माया-लेप से सर्वथा रहित निरञ्जन हैं — उन अद्वितीय भगवान् श्री राम का मैं भजन करता हूँ।
॥ ४ ॥
सहप्रपञ्चकल्पितं ह्यनामरूपवास्तवम्।
निराकृतिं निरामयं भजे ह राममद्वयम्॥ ४ ॥
अर्थ : जो इस दृश्यमान सम्पूर्ण प्रपञ्च (संसार) की रचना के अधिष्ठान हैं, किन्तु वस्तुतः जो नाम और रूप की सीमाओं से सर्वथा परे (अनाम व अरूप) हैं, जो निराकार एवं समस्त विकारों व क्लेशों से मुक्त (निरामय) हैं — उन अद्वितीय प्रभु श्री राम का मैं भजन करता हूँ।
॥ ५ ॥
निष्प्रपञ्चं निर्विकल्पं निर्मलं निरामयम्।
चिदेकरूपसन्ततं भजे ह राममद्वयम्॥ ५ ॥
अर्थ : जो सांसारिक प्रपञ्चों से परे, विकल्प-रहित (निर्विकल्प), परम निर्मल, दोषरहित तथा नित्य अखण्ड चैतन्य स्वरूप (चिदेकरूप) में स्थित हैं — उन अद्वितीय सच्चिदानन्द श्री राम का मैं भजन करता हूँ।
॥ ६ ॥
भवाब्धिपोतरूपकं ह्यशेषदेहकल्पितम्।
गुणाकरं कृपाकरं भजे ह राममद्वयम्॥ ६ ॥
अर्थ : जो संसार-सागर को पार कराने के लिए नौका (पोत) के समान हैं, जो सम्पूर्ण शरीरों में अन्तर्यामी रूप से अधिष्ठित हैं, दिव्य सद्गुणों की खान और दया के आगार हैं — उन अद्वितीय परमात्मा श्री राम का मैं भजन करता हूँ।
॥ ७ ॥
महावाक्यबोधकैर्विराजमानवाक्पदैः।
परं ब्रह्मसद्व्यापकं भजे ह राममद्वयम्॥ ७ ॥
[Translation]
जो वेदों के महावाक्यों ('तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि) के बोधक दिव्य पदों द्वारा प्रकाशित होते हैं, जो सत्-स्वरूप, सर्वव्यापी परब्रह्म परमात्मा हैं — उन अद्वितीय भगवान् श्री राम का मैं भजन करता हूँ।
॥ ८ ॥
शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्।
विराजमानदेशिकं भजे ह राममद्वयम्॥ ८ ॥
अर्थ : जो परम कल्याण (शिव) प्रदान करने वाले हैं, आत्यन्तिक सुखदाता हैं, भव-बन्धनों को छिन्न-भिन्न करने वाले हैं, अज्ञान रूपी भ्रम का नाश करने वाले हैं और साक्षात् जगद्गुरु (देशिक) के रूप में शोभायमान हैं — उन अद्वितीय प्रभु श्री राम का मैं भजन करता हूँ।
॥ ९ ॥
रामाष्टकं पठति यः सुखदं सुपुण्यं
व्यासेन भाषितमिदं शृणुते मनुष्यः।
विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं
संप्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम्॥ ९ ॥
अर्थ : महर्षि वेदव्यास द्वारा उच्चरित इस सुखदायी और परम पवित्र रामाष्टक का जो मनुष्य नित्य पाठ करता है अथवा श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है; वह इस संसार में उत्तम विद्या, ऐश्वर्य (लक्ष्मी), अपार सुख तथा अनन्त कीर्ति को प्राप्त करके अन्त में देहावसान होने पर परम मोक्ष को प्राप्त करता है।
॥ इति महर्षिवेदव्यासविरचितं श्रीरामाष्टकं सम्पूर्णम् ॥