॥ श्रीहरिः ॥
श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन

गोस्वामी तुलसीदास

🌸 स्तोत्र

गोस्वामी तुलसीदास कृत 'विनयपत्रिका' (पद ४३) का यह पावन पद सम्पूर्ण भारत और विशेष रूप से चित्रकूट धाम के रामघाट की संध्या महाआरती में गाया जाने वाला सर्वप्रिय भजन-स्तोत्र है। हरिगीतिका छन्द में रचित इन पावन पंक्तियों में प्रभु श्रीराम के अलौकिक सौन्दर्य, शील, शक्ति और करुणा का रसपूर्ण वर्णन है। इसके नित्य गान से हृदय के काम, क्रोध, मद, मोह आदि दुर्गुणों का शमन होकर निर्मल भगवद्भक्ति की प्राप्ति होती है।

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन

गोस्वामी तुलसीदास कृत 'विनयपत्रिका' (पद ४३) का यह पावन पद सम्पूर्ण भारत और विशेष रूप से चित्रकूट धाम के रामघाट की संध्या महाआरती में गाया जाने वाला सर्वप्रिय भजन-स्तोत्र है। हरिगीतिका छन्द में रचित इन पावन पंक्तियों में प्रभु श्रीराम के अलौकिक सौन्दर्य, शील, शक्ति और करुणा का रसपूर्ण वर्णन है। इसके नित्य गान से हृदय के काम, क्रोध, मद, मोह आदि दुर्गुणों का शमन होकर निर्मल भगवद्भक्ति की प्राप्ति होती है।

॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन (श्रीराम स्तुति) ॥
(गोस्वामी तुलसीदास विरचित — विनयपत्रिका)
॥ १ ॥
श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
नवकञ्ज लोचन कञ्ज मुख कर कञ्ज पद कञ्जारुणम्॥ १ ॥
अर्थ : हे मन! कृपालु श्रीरामचन्द्रजी का भजन कर, जो संसार के दारुण (अत्यंत भयानक) जन्म-मरण रूपी भय को हरने वाले हैं। जिनके नेत्र नूतन खिले हुए कमल के समान मनोहर हैं, जिनका मुखारविन्द कमल सदृश है तथा जिनके कर-कमल और चरण-कमल प्रातःकालीन लाल कमल के समान अरुण कान्ति वाले हैं।
॥ २ ॥
कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनीलनीरद सुन्दरम्।
पटपीत मानहुँ तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरम्॥ २ ॥
अर्थ : जिनका रूप-सौन्दर्य अगणित कामदेवों की छटा को भी लजाने वाला है, जिनका नील-श्याम श्रीअंग नवीन जल-भरे मेघ के समान परम सुन्दर है, जिनके शरीर पर शोभायमान पीताम्बर मानो सघन मेघों के बीच बिजली के समान चमक रहा है — उन परम पवित्र, जानकीजी के प्रियतम (वर) भगवान् श्रीराम को मैं सादर प्रणाम करता हूँ।
॥ ३ ॥
भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्दकन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनम्॥ ३ ॥
अर्थ : हे मन! उन दीनों के बन्धु, सूर्यवंश के सूर्य, दानवों और असुरों के वंश का समूल संहार करने वाले, रघुकुल-आनन्द, परमानन्द के मूल कन्द, कोशल देश के पूर्ण चन्द्रमा और महाराज दशरथ के प्रिय नन्दन भगवान् श्रीराम का नित्य भजन कर।
॥ ४ ॥
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं।
आजानुभुज शर चाप धर सङ्ग्राम जित खरदूषणम्॥ ४ ॥
अर्थ : जिनके मस्तक पर रत्नजटित मुकुट, कानों में सुन्दर कुण्डल, ललाट पर मनोहर तिलक तथा समस्त अंगों पर दिव्य और उदार आभूषण सुशोभित हैं; जिनकी भुजाएं घुटनों तक लम्बी (आजानुबाहु) हैं, जो हाथों में धनुष-बाण धारण किए हुए हैं और जिन्होंने समरांगण में खर-दूषण जैसे महापराक्रमी निशाचरों को पराजित किया है।
॥ ५ ॥
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रञ्जनं।
मम हृदयकञ्ज निवास कुरु कामादि खल दल गञ्जनम्॥ ५ ॥
अर्थ : गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं — हे देवाधिदेव शिवजी, शेषनाग और मुनीश्वरों के मनों को आनन्दित करने वाले तथा काम, क्रोध, मद, लोभ आदि दुष्ट विकारों के दल का दलन करने वाले प्रभु श्रीराम! आप मेरे हृदय रूपी कमल में सदा-सर्वदा निवास कीजिए।
॥ ६ ॥
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर सांवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
अर्थ : (श्रीसीताजी की गिरिजा-पूजा का पावन फल): जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हुआ है, वही स्वाभाविक रूप से परम सुन्दर और साँवला वर (श्रीराम) तुम्हें प्राप्त होगा। वे दया के सागर और सर्वज्ञ हैं, तुम्हारे पवित्र शील और विशुद्ध स्नेह को भली-भाँति जानते हैं।
॥ ७ ॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मन्दिर चली॥
अर्थ : इस प्रकार श्रीगौरीजी का मंगलमय आशीर्वाद सुनकर जानकीजी और उनकी सखियाँ हृदय में अत्यंत हर्षित हुईं। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे जगदम्बा भवानी की बारम्बार पूजा-वन्दना करके परम प्रसन्न मन से राजमहल को लौटीं।
॥ इति गोस्वामी तुलसीदास विरचित श्रीराम स्तुति सम्पूर्णा ॥