विनयपत्रिका — चित्रकूट महिमा एवं राम-निवेदन
गोस्वामी तुलसीदास
गोस्वामी तुलसीदास कृत 'विनयपत्रिका' कलिकाल के संतापों से मुक्ति के लिए प्रभु श्रीराम के दरबार में प्रस्तुत की गई प्रसिद्ध विनय-याचिका है। परम्परा के अनुसार तुलसीदास जी को चित्रकूट के रामघाट पर साक्षात् भगवान श्रीराम के दर्शन हुए थे ('चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर...')। इस संकलन में चित्रकूट यात्रा का प्रेरणादायी पद तथा आत्म-निवेदन के सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं अमर पद सम्मिलित हैं।
॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ विनयपत्रिका — चित्रकूट महिमा एवं राम-निवेदन ॥
॥ पद १ : अब चित चेति चित्रकूटहि चलु (पद २४) ॥
॥ १ ॥
अब चित चेति चित्रकूटहि चलु।
कोपित कलि,
लोपित मङ्गल मगु, बिलसत बढ़त मोह-माया-मलु॥
करम-सूल कुलिसनि परिहरि,
सब सुख-साधन सनेह-सुफलु।
तुलसीदास प्रभु-पद-पङ्कज भजु,
तजि प्रपञ्च कामदगिरि-थलु॥ १ ॥
अर्थ :
हे चित्त! अब तो जाग और चित्रकूट की ओर चल। कलिकाल अत्यंत कुपित हो रहा है, उसने समस्त कल्याणकारी धर्म-मार्गों को लुप्त कर दिया है और विषय-वासनाओं व मोह-माया का मैल निरंतर बढ़ता जा रहा है। कर्म रूपी कठोर शूलों और वज्र समान दुःखों को त्यागकर, समस्त सुखों के सार और प्रभु-प्रेम के पावन फल को प्राप्त करने के लिए — हे तुलसीदास! सांसारिक प्रपंचों को छोड़कर कामदगिरि की पावन भूमि पर श्रीराम के चरणकमलों का भजन कर।
॥ पद २ : ऐसो को उदार जग माहीं (पद १६२) ॥
॥ २ ॥
ऐसो को उदार जग माहीं।
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर,
राम सरिस कोउ नाहीं॥
जो गति जोग बिराग जतन करि,
जेहि नहिं पावत मुनि ग्यानी।
सो गति दई गीध सबरी कहँ,
प्रभु न बहुत जिय जानी॥ २ ॥
अर्थ :
इस संसार में प्रभु श्रीराम के समान ऐसा कौन परम उदार है? जो बिना किसी सेवा या स्वार्थ के भी केवल दीनता देखकर ही द्रवित (कृपालु) हो जाता है। जिस परम गति (मोक्ष) को बड़े-बड़े ज्ञानी मुनि करोड़ों यत्न, योग और वैराग्य से भी प्राप्त नहीं कर पाते; वही परम गति प्रभु ने जटायु गीध और भीलनी शबरी को सहज ही प्रदान कर दी और मन में यह भी नहीं माना कि मैंने कुछ बड़ा उपकार किया है।
॥ ३ ॥
जो संपदा बिभीषन कहँ अति सकुच सहित हरि दीन्ही।
सो संपदा दसानन सिव कहँ दीन्हि सीस दस दीन्ही॥
तुलसीदास सब भाँति सकल सुख,
जो चाहसि मन मेरो।
तौ भजु राम,
काम सब पूरन, करहिं कृपानिधि तेरो॥ ३ ॥
अर्थ :
जिस लंका के अकूत ऐश्वर्य को पाने के लिए रावण ने शिवजी को अपने दसों शीश काटकर हवन कर दिए थे; वही सम्पूर्ण राज-वैभव भगवान् श्रीराम ने विभीषण को संकोच के साथ (यह सोचकर कि यह बहुत अल्प भेंट है) समर्पित कर दिया। तुलसीदास कहते हैं — हे मेरे मन! यदि तू सब प्रकार से सम्पूर्ण सुख और शान्ति चाहता है, तो कृपानिधान श्रीराम का भजन कर; वे ही तेरी समस्त कामनाओं को पूर्ण करेंगे।
॥ पद ३ : जाके प्रिय न राम बैदेही (पद १७४) ॥
॥ ४ ॥
जाके प्रिय न राम बैदेही।
तजिए ताहि कोटि बैरी सम,
जद्यपि परम सनेहा॥
तज्यो पिता प्रहलाद,
बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो,
कंत ब्रजबनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥ ४ ॥
अर्थ :
जिस व्यक्ति को भगवान् श्रीराम और माता जानकी प्रिय न हों; उसे करोड़ों शत्रुओं के समान तुरंत त्याग देना चाहिए, भले ही वह सांसारिक दृष्टि से अपना अत्यंत स्नेही सम्बन्धी क्यों न हो। भक्त प्रह्लाद ने अपने पिता को, विभीषण ने अपने भाई रावण को, भरत ने अपनी माता कैकेयी को, राजा बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य को और ब्रज की गोपियों ने अपने पतियों को भगवान् के लिए त्याग दिया था और वे सभी जगत में परम पूज्य और मंगलकारी बन गए।
॥ ५ ॥
नाते नेह राम के मनियत,
सुहृद सुसंख्य जहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै,
बहुतक कहौं कहाँ लौं॥
तुलसी सो सब भाँति परम हित,
पूज्य प्रान ते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद,
एतो मतो हमारो॥ ५ ॥
अर्थ :
संसार में जितने भी सच्चे मित्र और सम्बन्धी हैं, वे सब श्रीराम के संबंध से ही आदरणीय माने जाते हैं। ऐसे काजल से क्या लाभ जिससे आँख ही फूट जाए? तुलसीदास कहते हैं — हमारे विचार से तो वही व्यक्ति सब प्रकार से परम हितैषी, पूजनीय और प्राणों से भी अधिक प्यारा है, जिसकी संगति से प्रभु श्रीराम के पावन चरणों में अनन्य प्रेम उत्पन्न हो।
॥ इति विनयपत्रिकायाः चित्रकूटरामपदानि सम्पूर्णाणि ॥
॥ ॐ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ॥